एक लड़की के दुल्हन बनते ही
होने लगती है मौत शनै - शनै
उसकी स्वतंत्रता की,निजता की
विवाह के नाम पर पति नाम की
बेड़ियां जकड़ लेती हैं उसे
कभी अधिकार के नाम पर तो
कभी रिवाजों के नाम पर
खत्म कर दिया जाता है उसका वजूद
जोड़कर नाम अपना, 
कर दिया जाता है
अंत उन सपनों का
 जो देखे हैं उसकी आँखों ने 
कभी सोकर ,कभी जागकर
घुटती है सिसकती है आहें रोज भर्ती है
चाहकर भी कभी तोड़ नहीं पाती है
एक लड़की जब दुल्हन बन जाती है
कभी अरमानों का गला घोटती है
तो कभी मां- बाप से मिलने को तरसती है
मान्यताओं के नाम पर ,
रोज बलि चढ़ती है
साथ देने के नाम पर ,
घर और बाहर दोनों जगह खटती है , 
करती ही क्या हो
फिर भी दिन - रात यही सुनती है
मचलते अहसासों को
दिल मे दफन कर देती है
एक लड़की जब दूल्हन  बनती है।।


                       आशा झा " सखी