तन्हाई ही बदी थी, तो फिर कोई दस्तक कैसी? उसने आना नहीं हमने जाना नहीं, तो फिर ये बेकरारी कैसी? खुदा जब खुद में ही है, ...
अन्य रचनाएंइंसाफ को जोहते ,इक उम्र गुज़र गई, ताउम्र तारीखों का दौर चलता रहा।। उम्दा सुनी, अल्हड़ परोस दी,वाह वाही के साथ, कविताई का दौर...
अन्य रचनाएंजब भी कभी दुपट्टा सिर पर रखने की रिवायत को याद करके दुपट्टा लेने लगती हूं तो वे याद आ जाती हैं,अपनी हिदायत के साथ, चुन्नी सिर त...
अन्य रचनाएंमैं नहीं जानती, तुम कहाँ हो ,कैसे हो जिन्दा भी हो या मर गए। मेरे लिए तो ज़िन्दा और मरे बराबर ही हो।मैं तुम्हें लिखना तो नहीं चाहती थी,पर मुझ...
अन्य रचनाएंरश्मिरथी सभी अधिकार सुरक्षित 2018-2022