मैंने अपने पिता में भी मां की छवि पाया है; पिता को भी मां की तरह फिक्रमंद देखा है। पिता बेटियों के जीवन चलचित्र का नायक; पिता की नजर...
अन्य रचनाएंमैंने अपने पिता में भी मां की छवि पाया है; पिता को भी मां की तरह फिक्रमंद देखा है। पिता बेटियों के जीवन चलचित्र का नायक; पिता की...
अन्य रचनाएंहे ईश करूं क्या तुझे अर्पण दिया तूने मुझे इतना सुन्दर जीवन। प्राणों से भी जयादा चाहा मुझको मिला ऐसे माता -पिता का संबल। हर जन्म में तू म...
अन्य रचनाएंहे ईश करूं क्या तुझे अर्पण दिया तूने मुझे इतना सुन्दर जीवन। प्राणों से भी जयादा चाहा मुझको मिला ऐसे माता -पिता का संबल। हर जन्म में तू म...
अन्य रचनाएंउन रेशों को मत उधेङना जो बारीकी से गुंथे हुए हैं । जिन पर रिश्तों की बुनियाद है, उन कङियों को जरा सम्भाल कर रखना ; ये बङे नाजुक हैं । कि जर...
अन्य रचनाएंउन रेशों को मत उधेङना जो बारीकी से गुंथे हुए हैं । जिन पर रिश्तों की बुनियाद है, उन कङियों को जरा सम्भाल कर रखना ; ये बङे नाजुक हैं । कि जर...
अन्य रचनाएंये अक्षर नहीं बंद दरख्तों से झांकते रोशनदान हैं। खुलता जिससे विहंगम दृश्य है, स्वप्न को अर्थ देते,मृग शावकों सी कुलाच भरते हैं। स्वप्न वजह ...
अन्य रचनाएंअतीत के पन्ने स्याह से, खोये हुए अपनों के बिना निर्जीव से,, यादों के अवलम्ब पर बनते चित्र निर्मूल .. घर की पगडंडियों भी अब अपरिचित सी.. माल...
अन्य रचनाएंइक वक्त था "प्यारी माँ" जब तू मुझे दुलारती थी। हाथों से अपने मुझे रोज़ संवारती थी। मेरे ही सपने अपनी आँखों में संजोती थ...
अन्य रचनाएंमां मैंने फूलों को झरते हुए देखा! लगा मैंने तुम्हें हँसते हुए देखा!! मैंने पत्तियों को झूमते देखा हवाओं संग , मुझे लगा तुम किसी...
अन्य रचनाएंडर मेरे मन का!! 🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का तू जरा ठहर! मुझे मत डरा. 🔹️🔹️🔹️🔹️ मैं जानती हूं तू कितना कमजोर है! प्रयास की थोङे टक्करों स...
अन्य रचनाएं" ओ गुलमोहर तू कैसे खिलता है इतनी कङी धूप में? विस्तृत लाल रंग की चुनर में जैसे कोई परिणिता जीवन के कङे धूप को अपनी हंसी...
अन्य रचनाएं🔹️🔹️🔹️🔹️ डर मेरे मन का तू जरा ठहर! मुझे मत डरा. 🔹️🔹️🔹️🔹️ मैं जानती हूं तू कितना कमजोर है! प्रयास की थोङे टक्करों से तू बिखर ---बि...
अन्य रचनाएंजीवन की कठिनाई से संभावनाऐं मरा नहीं करती वो देखो हरित हो चला कङी धूप सहकर अमलतास भी। जो अन्दर था पनप रहा, ,वही तो आएगा बाहर भी...
अन्य रचनाएंकर्तव्य पथ आरूढ; निज -धर्म निभाता हूं। हां पिता हूं व्यक्त नहीं कर पाता हूं!! मेरे ह्रदय के टुकडों सुनो~ मैं अब तुमलोगों में ही जिन्दा हूं।...
अन्य रचनाएंमां कौन कहता तुम नहीं हो, तुम हो यहीं हो मेरे मन में, ईस जीवन में फूलों की खुशबू की तरह शामिल हो। दिन के उजाले की तरह नित्य हो!...
अन्य रचनाएंआज का दिन मेरा है। किसी टैब के ब्लैंक पेज की तरह। हम जो चाहें लिख सकते... जो चाहे बना सकते... नदियां,फूल,पहाङ,कलाकृतियां। सहेज सकते बनाकर स्...
अन्य रचनाएंहै मतलब की दुनियाँ ये मुझे इससे बचाना तुम मुझे इंसान बनाया है मेरी इंसानियत बचाना तुम। जरा पतवार कच्ची थी... मेरी पतवार कच्ची थी ... मेरी नै...
अन्य रचनाएंमां तू कण-कण में; जीवन के हर क्षण में; मेरे तन के.... कोशा-द्रव में; प्रतीत होती है; कहां खोजें और तुम्हें; इस मन से तू दूर कहां...
अन्य रचनाएंमाँ तू नहीं पर तेरी आहट्टे हैं,, स्मृति की दिवारों से टकराकर गूंजती तुम्हारी तस्वीरें हैं,, चलचित्र की भांति मन की भित्तियों पर दिख ही जाती...
अन्य रचनाएंरश्मिरथी सभी अधिकार सुरक्षित 2018-2022