मैं जहर के घूंट पीना जानती हूँ जख्म अपना खुद ही सीना जानती हूँ !!!! है परख मुझको भी हर इंसान की छांट लूंगी पत्थरों से नगीना, जानती हूँ !!!!...
अन्य रचनाएंक्या पढ़ पाई थी तुमने मेरे नयनों की पाती खुद मैं समेट पीड़ा को ज्यों जली दीप संग बाती!! देहरी पर दीपशिखा बनकर नहलाती रही तिमिर को फिर भी मैं...
अन्य रचनाएंहो गई प्रकृति ज्यों प्राणवंत लावण्य चतुर्दिक निखर उठा!! ऋतुराज का फैला है जादू प्रमुदित हो कानन चहक उठा!! रक्तिम पलाश ने बांध...
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