गंगा के तट पर विश्वनाथ की नगरी में बड़ी सभा थी महानुभावों की वहाँ एक महान तेजपुँज तपस्वी रुप कर रहा था पथ प्रदर्शन करा रहा था ईश दर्शन तभी म...
अन्य रचनाएंस्वर्णिम भवन कलश कंगूरा सौन चिरैया जामै रहती उजड़ौ बिखरौ चमन आज वो माता जामैं आहें भरती । उ...
अन्य रचनाएंमोह निशा की आकाशगंगा में डुबकियाँ लगाते समय अचानक सुनाई दिया एक शब्द जागते रहो जागते रहो उस दिन मेरी समझ से परे रहा और मैं सोचने लगी कि बच...
अन्य रचनाएंउसके पुष्पित पल्लवित हर्षोल्लासित संसार के शीश से काल ने जब एक झटके में सतरंगे आकाश की चादर खींची तो धरती खुद व खुद न ...
अन्य रचनाएंमौन हूं पर अनभिज्ञ नहीं मैंने देखा है बहुत करीब से जज़्बातों की बारात में जहां तहां अकेले भटकते नेह को जैसे सावन से झुलसते मेह को फुहारों की...
अन्य रचनाएंउस समय जब माँ की गोद में बैठ कुछ हरफ सीखने थे मुझे माँ के आँचल में छिपी मणियों में से कुछ मणियाँ संजोकर रखनी थीं अपनी झोली में...
अन्य रचनाएंमैं अंतिम स्वांस गिन रही थी और वह मेरे इधर उधर बैठे कुछ फुसफुसा रहे थे आपस में शायद जानना चाहते थे मेरी जमा पूंजी जो जीवन भर में छिपाकर र...
अन्य रचनाएंकैसे कह सकते हो कि मैं तन्हा और अकिंचन हूँ देखा है कभी मेरे इर्द-गिर्द ओर पास घूम घूम कर मेरे अन्तर में झाँक कर नहीं न सुनो साथी हैं...
अन्य रचनाएंज़िन्दगी की शून्यता भरने को न जाने कितने शून्य जोड़े परन्तु परिणाम क्या हुआ शून्य ही न उद्विग्न मन की वेदना आंखों में चुभते टूटकर बिखरे स्वप...
अन्य रचनाएंभूख की आग में झुलसती अंतणियाँ सिसकियाँ भरतीं छिपी बैठीं हैं उदर के किसी अनजान सूने कौने में वहीं दुर्दिनों में स्वजनों (घुटनों) द्वार...
अन्य रचनाएंयूँ पूछा किसी ने एक औरत होलिका जली या जलाई गई पर क्या औरत थी वह क्या ममता करुणा दया त्याग समर्पण जैसे गुण थे उसमें नहीं न जो धन वैभव ताकत...
अन्य रचनाएंबुराई पर अच्छाई की विजय की प्रतीक होली सदियों से जला रहे हैं परन्तु वह आज तक नहीं जल सकी है। कश्यप ॠषि के द्वितीय पुत्र हिरण्यकशिपु अर्थात...
अन्य रचनाएंएक अनबूझ पहेली एक अनकही कहानी हूँ मैं मैं नारी हूँ समां की तरह जलना ही फितरत है मेरी जलती रही मैं तुम्हारे जीवन के अँधेरे मिटाने मगर यह क्...
अन्य रचनाएंयह कौन विहग है रे ? जो रुई के फाहे से सुकोमल पंखों के सहारे व्योम के आँचल से तारों के मोती चुन चुनकर झोली में समेटे सुरभित समीर की पालक...
अन्य रचनाएंसदियों से कुचले जाते इस जीवन की सच्चाई क्या है क्या उस सच्चाई तक कभी नजर गई है तुम्हारी नहीं न तुम्हारी नजर में तो सिर्फ और सिर्फ एक जिस्म...
अन्य रचनाएंनिष्क्रिय निस्तेज सी पड़ी जगती में प्राण ऊर्जा सी फूंकता यामिनी की कोख से निकल रक्त लिप्सित नवजात शिशु सा या शत्रु के रक्...
अन्य रचनाएंमैं मरना चाहती हूं क्या तुम मेरे साथ मरना चाहोगे क्या कहा नहीं हां मैं भली प्रकार जानती थी तुम मेरी जिन्दगी या मौत को कहां चाहते हो तुम तो...
अन्य रचनाएंबड़े ही चाव से मैं बुनती रहती निरन्तर भावों के रजत मानिंद धागों से रेशमी घरौंदा ताकि रह सकूं पुरसुकून जीवन भर उसमें पर यह क्या आभास भी नही...
अन्य रचनाएंकोई शब्दों का जादूगर है जो शब्दों का प्रयोग बेहद खूबसूरती और चमत्कृत ढंग से करता है तब कोई है एक कुशल खिलाड़ी जो कहता है शब्दों से खेलना त...
अन्य रचनाएंप्रेम के गलियारों में नीति ज्ञान का बलिदान बहुत मीठा लगा न इसका एक पक्ष मिठास से सराबोर है तो दूसरा कड़वाहट की पराकाष्ठा चूं चूं...
अन्य रचनाएंरश्मिरथी सभी अधिकार सुरक्षित 2018-2022