ख्वाहिशें तमाम पाल रखी थी इस दिल मेंं।
उम्मीद किया था कि कभी न कभी तो पूरी होंगी।
पर ये मालूम ना था
इन्हें पूरी करने की चाहत में ये इस तरह दफ़न हो जाएंगी।
तेरे साथ की आरज़ू ने इस तरह बेचैन किया।
तमाम लोगों की मशवरे पर न गौर किया।
तुम्हें कभी न कभी मेरी वफ़ा याद आएगी।
तेरी वेवफाई को अपनी वफ़ा से तब्दील किया।
तमाम उम्र तन्हा गुज़ार दी
महफिलों में कहकहे लगाकर।
तेरी यादों ने तनहाई मेंं जीने ना दिया।
तेरे बेरुखी से इस कदर घायल हुए।
लोगों के ताने इस द़िल पे बेअसर हुए।
हम तो मान बैठे थे बंधन उम्र भर की।
दो घड़ी मेंं ही तुमने दामन झटक दिया।
स्नेह लता पाण्डेय
नई दिल्ली

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