चलती है कलम जुबां रुक जाती है
तेरे एहसास से आखें भर आती है
गिर पड़ते हैं कुछ अश्क पन्नों पर
उन बूँदों में भी तूँ ही नजर आती है

दिखता नहीं किनारा, कहाँ चले गए तुम 
हर साँस पर क्यूँ दर्द उभर आती है 
मायूस बनकर फिर रहा हूँ मारा मारा 
मेरे हालात पर क्यूँ नहीं तरस आती है 

अनसुलझी सी कोई पहेली है तूँ
हर किसी से ही तूँ रम जाती है 
वक़्त आता है जब भी कभी मेरा 
मुझसे क्यूँ हमेशा तूँ रूठ जाती है 




                 संजय निराला