बहुत दिनों बाद कुछ अपना मौलिक लिखा है मैंने... कुछ विशेष तो नहीं लेकिन एक संस्मरण का कुछ अंश है।

मंगरेश भैया तो वैसे बड़े ही मजाकिया और मस्तमौला स्वभाव के व्यक्ति हैं। लेकिन उनके भीतर एक अद्भुत दार्शनिक और आध्यात्मिक और बैरागी व्यक्तित्व समाहित है। और उनका वैराग्य श्मशान वाला वैराग्य नहीं है अपितु साश्वत वैराग्य है। और जब उनके अंदर का वो आध्यात्म बाहर प्रस्फुटित होता है। तो समक्ष खड़ा व्यक्ति उस आध्यात्मिक तेज को अनुभव करता है और बिना प्रभावित हुए रह ही नहीं सकता। मुझे तो लगता है कि इनके जैसे स्वभाव का व्यक्ति कैसे इन सांसारिक बंधनों में अब तक बंधा हुआ है? ऐसा लगता है कि इन्हें ना किसी के जन्म लेने से हर्ष की अनुभूति होती है और ना ही किसी की मृत्यु का शोक... मैंने कभी उन्हें मोह के वशीभूत होकर सत्य को झुठलाते नहीं देखा।
आप ये कभी नहीं कह सकते हैं कि ये व्यक्ति जो जीन्स और टी शर्ट पहने मतवाला सा भटकता है, वो गेरुआ वस्त्र पहने हुए सन्यासी सा स्वभाव रखता है। भैया ने मुझसे कुछ वर्ष पहले कहा था कि पितृ ऋण और मातृ ऋण के बंधन से बंधा हुआ हूं, नहीं तो मैं कब का संन्यास ले लेता।
सन्यास की ओर मंगरेश भैया का आकर्षण बचपन से रहा है... साधुओं का वो गेरुआ वस्त्र उन्हें बहुत आकर्षित करता है, साधुओं के प्रति आकर्षण का एक और कारण यह भी है कि साधु सन्यासी भ्रमणशील, मोह मया से मुक्त स्वछंद रूप से विचरण करने वाले होते हैं और मंगरेश भैया भी इसी स्वभाव वाले रहे हैं। मैंने उनके साथ बहुत सी यात्राएं की। और जब भी वो किसी एकांत स्थान से गुजरते तो कहतें- छोटे! एकांत वास हो और इतना सन्नाटा पसरा रहे कि आप स्वयं की हृदय गति को स्वयं सुन रहे हों, तो उस स्थान पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिए। क्यूंकि आप उस समय स्वयं के मन की बात सुन रहे होते हैं और हर जीव के हृदय में परमेश्वर का वास होता है। क्या पता आपको उस परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाए जो रहता तो आपके भीतर ही है। और आपको नित प्रतिदिन आवाज देता है कि हे प्राणी! तू उस परम तत्व की बात सुन और इस जगत की सत्यता को जान... तू मुझे जान, लेकिन इस संसार के शोर शराबे के कारण लोग सुन नहीं पा रहे हैं, और कुछ लोग सुनना नहीं चाहते हैं। और जो सुन लेते हैं वो मोह से छूट जाते हैं।
जीवन के सत्व को जो समझ गया वो ही परमेश्वर रूपी तत्व को जान सकता है...। जीवन में मौन आपको ये आभास दिलाता है कि परमसत्य तो मौन ही है... मृत्यु मौन रहकर भी सत्य बता देती है। इसलिए जहां भी एकांत देखो समझ लो वहां परमसत्य समाहित है... और जहां परम सत्य समाहित है वहां अवश्य ही परमेश्वर हैं।
एकांत ही मृत्यु है... मृत्यु ही सत्य है... सत्य ही परमतत्व है... और यही मोक्ष है।

✍️सोमेश त्रिवेदी(पीयूष)