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जीवन के ज्वार को समेटी हुई
खामोशी है ।


पहले माँ-बाप होने की और फिर बढ़ते 
नवीन जीवन की अनगिनत जिम्मेदारियों
की तस्वीर हैं दादा-दादी ।

आज के जीवन की तन्हाई को कहती
एक कहानी हैं दादा-दादी ।

और उस अकेलेपन में भी सबकी फिक्र,
सबकी राह ताकती,

इस कठोर जीवन की तकलीफों को छिपाय
छिपकर रोती सच्चाई हैं दादा-दादी ।

घनघोर सावन की तरह हमेशा प्यार बरसाती
रिमझिम बारिश हैं दादा-दादी ।

बस इतना कहूँ........

घने बरगद की जड़ों से सींची हुई मधुर
छांव लिए,

और उस पर अठखेलियाँ करने पर खुश 
होती धरती हैं दादा-दादी.............

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सारे दादा- दादियों को समर्पित।....।......।

मुकेश दूहन
सोनीपत, हरियाणा