मैं माँ भारती हूँ!
तुम सबकी माँ!
मैं व्यथित हूँ,
स्तब्ध हूँ, निराश हूँ!
माँ भारती के,
बच्चे होकर,
तूने ये क्या किया??
क्यों किया??
माना तुम अन्नदाता,
कहाते हो!
पर ,अपने ही भाइयों,
को सताते हो!
कितनी खुश थी मैं,
तिरंगे को देख!
देश के कोने कोने,
से आई झाँकी को देख!
मेरी सारी खुशी,
काफूर कर दी तूने,
अपने ही भाइयों का,
लहू बहाया तूने!
अपनी बात मनवाने का,
यह रास्ता निकाला तूने!
नहीं तुम "अन्नदाता"
नहीं हो सकते!
अवश्य ही तुम,
मेरे आस्तीन में,
छिपे कोई गद्दार हो!
माँ भारती का,
अन्नदाता बेटा,
ऐसा हो ही,
नहीं सकता!
क्योंकि??
अन्नदाता,
मृत्युदाता हो,
ही नहीं सकता!
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श्वेता कर्ण!
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