व्याकुल अन्तर आत्मा है।
वचन तुम्हारा दम तोड रहा है"
प्रेम की ये परिभाषा क्या ।।
ह्रदय व्याथित है कर्म से वचितं"
किसके लिऐ ये पल है जिया!
किया कुठार घात क्यू तुमने"
सीना छलनी कर ही दिया ।।
मेरा अपना भेद भाव कर"
प्रेम मे दे दी जँजीरे!
अगर तोडना था शीशे सा"
फिर क्यू दी उम्मीदे।।
जो रस्सी मजबूत डोर थी"
वचन कई जनमो का था।
क्यू उसके धागे बिखराऐ"
छोड जाये वो बन्धन क्या।।
आज मे तुमसे विमुख हो गई "
अब कोई अरमान नही!
प्रणय निवेदन पुष्य धर्म है"
अब मुझको अभिमान नही ।।
रीमा ठाकुर (लेखिका)

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