उलझन भारी वो रात जैसे कभी बीतेगी ही नहीं चारों तरफ़ शोर ,दुःख , आखों में आशु , मा का करुण स्वर , बच्चो का अनजाने डर से खामोश हो जाना कभी खुद को देखते कभी आराम से सोती अपनी मां को .....
ओर मै मुझे तो अभी तक ये समझ नहीं आया कि ये सब लोग ऐसा क्यू कर रहें है आखिर इतने शोर में भी मैं सोइ हुए कैसे हूं ।
मेरी मां मेरे छोटे छोटे बच्चो को संभालने की कोशिश कर रही है वैसे ही जैसे कभी मुझे संभालती थी अगर मै दुखी होती थी ।
मैने दौड़ कर अपनी मां के पास गई आज वो मुझे पहले से भी ज्यादा प्यारी लग रही थी याद है मुझे मै तो कभी कहीं जाती ही नहीं थी अपनी मां को छोड़ कर हमेशा उसके आंचल में रहती वही सब कुछ था मेरा फिर एक दिन मा ने ही मुझे भेज दिया अपने से दूर ये बोल कर की वही तेरा घर है अब वही रहना है तुझे ...
हम्म कितना रोई थी मैं ओर मुझसे ज्यादा मेरी मां
पर मै तो ऐसी नाराज हुई कि बात ही नहीं की मा से पूरी एक दिन ,,, मा ने कितनी बार मनाया तब मानी मै ,हा नहीं तो ऐसे कोई दूर करता है अपनी ओलाद को ।
फिर मन लगने लगा अपने नए घर में , यहां के परिवार को ही अपना सब कुछ मान लिया था पर जिसका अपना बना कर मुझे भेजा गया वो तो कभी मेरा हुआ ही नहीं ,खुद को शरीफ दिखाना शुरू से ही आता था उसे ,अच्छाई की मूरत ,कोई बुराई नहीं ,दूसरो के सामने ऐसे जताना कि बहुत प्यार है पर दिखावा आखिर कब तक कोई करे ।
नहीं कर पाए बहुत दिन तक ,उस दिन मेरी पहली दीवाली थी ससुराल में ओर मुझसे कोई गलती हो गई उस दिन मुझे पता चला कि ये सब लोग जो अपना बनने का नाटक करते हैं वो तो मेरे कोई है ही नहीं मेरी मां तो कभी ऐसे लोगों के सामने बेज्जती नहीं करती थी हां थोड़ा डांट देती थी और आगे ध्यान रखना बोलती थी ।पर यहां तो एक गलती पर खाल उधेड़ दी मेरी ,, किसी ने सोचा ही नहीं कि मै भी इंसान हूं ओर मुझसे भी गलती हो सकती हैं सबने यही बोला मायका नहीं है तुम्हारा ,तुम्हारी मां नहीं आएगी अब काम करने ,बहू हो अब ।।।।
बहू .....मतलब अब मैं इंसान नहीं रही ,बेटी नहीं रही , बहन नहीं रही बस बहू हो गई हूं तो वसे ही रहना होगा मुझे ,
फिर से मैने अपनी दुनिया बदल दी एक औरत से सिर्फएक बहु बन गई सब खुश थे अब एक ओरत को मार कर अब एक बहु जो उनके घर आ गई थी ।
अब मेरे दो बच्चे भी हो गए मैं खुद मा बन गई मेरे अंदर की ममता ने मुझे फिर से औरत बना दिया
मैने अपने बच्चो के साथ जीना सीख लिया था अब मैं हस्ती भी थी और बच्चो की जिद के कारण अच्छे से तैयार भी हो कर रहती मेरी बेटी को कितना बुरा लगता जब सबकी मां अच्छे से बन सवर कर आती उसे लेने वो मै ऐसे ही चली जाती उसके चहरे पर मुस्कान देखने के लिए मेंने फिर से सजना संवरना शुरू कर दिया
यहां भी उस पुरुष को मौका मिल गया नीचा दिखाने का या निचे गीरने का ....हा हा अब याद आया यही तो हुआ था कल भी , मै अपने बच्चो को लेकर जैसे ही घर पहुंची वो पुरुष पहले से घर पर था जिसे संब मेरा पति कहते थे पर मैं नहीं जानती पति ऐसे होते हैं मेरे लिए वो सिर्फ एक पुरुष है और उसके लिए मैं घर को संभालने के लिए शायद कोई आया ओर ज्यादा हुआ तो उसकी अहम संतुष्टी का साधन ।
मुझे देखते ही जैसे भी शब्द उसके मुंह में आए उसने बोलना शुरू किया , उसका बस एक वाक्य में सुन पाई कि घर में काम नहीं चलता क्या जो ऐसे तेयार हो कर दूसरे आदमी को रीझाने जाती हैं उसके आगे भी वो बोलता रहा पर मेरे कान कहा कुछ सुन पा रहे थे पता नहीं कौन से जहान में पहुंच गई थी मैं ,
अब लग रहा है मर गई हूं मैं ,अच्छा क्या सच में मर गई हूं नहीं नहीं
मैं नहीं मर सकती मेरे बच्चो का क्या होगा ,मेरी मां का क्या होगा ,उसको केसे छोड़कर चली जाऊं मुझे भी मेरी मां सा बन ना है मगर अपनी बेटी को अपने जैसा नहीं बना ना है
वो पुरुष जिसके घर वो रहेगी उसका पति भी बनेगा तब अपनी बेटी को उसके घर की बहू बनाऊंगी।।।
रेणू सिंह

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