शाम आई,आई सितारे आए ।
चांद आया ,तुम्हारी याद आई ।
आंखे झर पड़ी कोहरे की तरह ।
रात भर उफ़! तुम्हारी याद आई ।
चांदनी रात ये समंदर का शोर।
फ़ेन उमड़ा, लहर पगलाई।
रेत में हमने घरौंदे बनाकर,
तुम्हें पुकारा तो बरसात आई ।
रात भर उफ,,,,,,
जंगली हवा में बहारों के फूल महक उठे।
रची फिजा में शहद की खुशबू,,
फिर भी तुम नहीं आई। तुम नहीं आई ।
रात भर उफ,,,
ये कुमुदिनी, ये चांदनी ये चकोर।
जंगलों में फिर नाच उठे मोर।
स्वाति बूंद भी, जा बसी सीप में।
उफ़ तुम कहां तुम!
बस याद आई।
रात भर बस तुम्हारी याद आई ।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

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