इश्क का बाजार लुटा है
आज फिर कोई सरेआम बिका है
खामोश रहकर बस देखती है दुनिया
आज फिर मजबूरी में रुह को बेच
किसी का घर-बार चला है
उजड़ गई इज्जत किसी की सिर्फ एक निवाले को
भूखे भेड़िए को जो परोसा उस बैचारी को
बच्चें थे घर में दो जो भूखे थे खाने को
उसी गरीबी का दर्द उसको हर बार मिला
मजबूरी में खुद को बैच उसका घर बार चलता था
फायदा उठाया किसी ने उसकी गरीबी का
जिस्म भी नौच खाया उस अबला बैचारी का
इश्क के नाम पर किसी ने
अपनी हैवानियत को दर्शाया है
तो किसी ने इश्क को ही अपना व्यापार बनाया है
कमबख्त ये दुनिया के खेल भी निराले हैं
बदनाम तो कर देते हैं आसानी से
पर दो वक्त की रोटी को हाथ तक नहीं बढ़ाते हैं
उल्टा किसी की मजबूरी का बेहिसाब फायदे उठाते हैं
ऐसे ही मजबूरी में किसी का घर बार चलता है
तब जाकर उनके घर का चूल्हा जलता है
पूनम लोहार
उदयपुर राजस्थान

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