विरह के पल चुभते बहुत है, पर ये ठण्डी सी हवा तेरे आंचल को सुकून देगी... कि समझ लेना मैंने ही आकर तुमको छु लिया था, और तुम अपनी धानी चुनर यों हवा में उछाल देना.... मैं समझ लूंगा... कि तुमने भी अपना आँचल फैलाया है, मेरे स्वागत के लिए।
अरे, कुछ शिकायत भरी नजरों से मत देखो मुझे, मेरे देर होने के कारण ऐसे सूखी हुई तुम्हारी गोदी मुझे अच्छी नहीं लगती.... मैं आ रहा हूँ, तुम्हारी रेशमी जुल्फों के समान हिलोरे खाते हुए ये वृक्ष मुझे अति आनन्दित कर रहे है, ये जो आवाज तुम सुन पा रही हो मेरे गर्जन की.... हाँ, मैं पुकार रहा हूँ तुमको... कि मेैं तेरे नजदीक आने को आतुर हूँ।
तरसती आँखों को और इंतजार नहीं कराऊँगा, पर कुछ अहसास तुम भी तो कराओ मुझे, कि कितनी बैचेन हो तुम मेरा आलिंगन करने के लिए, कहीं मैं गर्जना कर यूं ही आगे न निकल जाऊं ... कि यहाँ किसी को मेरा इंतजार नहीं।
धरती का जवाबी खत आसमान के नाम...
अरे, कैसे निकल पड़ोगे मुझे यूं तन्हा छोड़कर, जैसे कोई तालाब में नाव तैराने बैठा हो और सारा पानी अचानक सूख जाए... क्या बीतेगी उन अरमानों पर।
जब से तुम्हारा आना मुझे महसूस हुआ है, तब से अधर सी हो गई हूँ मैं...कि पत्ता भी नहीं हिल रहा, किसी नीर्जीव वस्तु के समान, साँसे भी अटक गई है मेरी.... कि अब तुम्हारी बूंदों के स्पर्श से ही इनमें सजीवता आएगी।
कभी-कभी बहुत नाचती हूँ मैं.... कि अब तुम आओगे, पर फिर तुम्हारे नाज-नखरे शुरु हो जाते है, और मैं नाचते- नाचते ही मुर्छित हो गिर पड़ती हूँ... कि अब तो तुम आओगे ओर मुझे गले से लगाओगे।
संदेश मिलते ही,आसमान की बूंदे जमीन पर आ गिरती है, दोनों का मिलन, अविस्मरणीय बन जाता है, प्रत्यक्ष देखने वाले को अपने महबूब की याद आ ही जाती है।
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रंजना सोनी

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