सपनों की मंज़िल आभासी होती है।
ढूंढो मत, भूलना समझदारी होती है।
ख्वाब रात का हों या हो सुबह का।
उसमें कभी भी सच्चाई नही होती है।
देखो ख्वाब खुली आँखों से दिनमें।
पुरे होने में मेहनत भी समाई होती है।
सपने वफ़ा के दिन के उजालों में मिले।
साथ उसमें तब मुहब्बत छुपी होती है।
अंजान रास्तों पर भटकने से बेहतर।
मंज़िल तलाशो, दिलोंमें बैठी होती है।
मिलना था हम को मंज़िलों पर कभी।
हम अकेले थे वहां, तुम ही नही होती है।
आसमानों की तरफ देखो उम्मीदों से।
आखरी फैंसले की बात वहीं होती है।
फिरोज दहिवाला

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