रूप को सजाना बार-बार....
, बिन तुम्हारे अच्छा नहीं लगता........।
दर्पण में चांद को निहारना बार-बार.........
 बिन तुम्हारे अच्छा नहीं लगता........।

वेणी में गूंथना मोगरे की माला.........
 नूतन परिधानों से तन को सजाना.........
 घूमने झील पर जाना बार-बार .........
बिन तुम्हारे अच्छा नहीं लगता........।

मुरझाने लगते हैं बागों के फूल..........
रीति रीति सी लागे नदिया की कूल...........
चिड़ियों का फुदकना.......... चहचहाना बारबार ...
 बिन तुम्हारे अच्छा नहीं लगता.........।

किसी से हंसना ,बोलना बतियाना.......
कभी कमल ....... 
कभी कुमुद सा खिल जाना.....
यौवन कुसुम को श्रृंगारना..... बार-बार .......
 बिन तुम्हारे अच्छा नहीं लगता.........।

      स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
               गोरखपुर