बेवजह ,यू ही -
मन के किसी, कोने मे"
दबाकर ,रख लिया 
एक, ज्वारभाटा"""
न हारने वाली, शिकस्त ,
न हार का ,मलाल"
पर जी ,तो लिया है"
,तुम्हे कही न कही"""
जो ,मिला काफी है"
उम्रभर के लिऐ,
कुछ, और चाहत,
नही जीने के लिऐ""
ये जिन्दगी का "
रंगमंच है,कलाकार"
सभी है,पर रंग तो ,
खून मे होता है,
चाहे,वो देश के लिऐ बहे"
या अपनो के लिऐ"
खत्म तो तभी हो जाता,
है,सबकुछ,जब पलटकर,
नही "देखते कुछ अपने"
नजरें तलाशती है ,उन्है"
पर ,मुडकर देखते भी नही"
कई सवाल ,ढूढँता है मन,
कल जो ,सही था,आज गलत"
कैसे हो गया ,,,,
क्या इतनी कमजोर डोर थी "
बंधन की, जो हवा का झोका"
भी न सह सकी,,,,
मलाल ऐ नही की हम टूटे"
बिखरे ,तो तुम भी कही न कही""
यही तो जिन्दगी है,अब समझा,
रही है सबकुछ,,
कई अपने रुठे,कई अपने छूटे,
जो कभी ,लडते थे ,हक के लिऐ"
अब वही,अकेला छोड गये""
एक दिन तो,सबकुछ छोड 
जाना है,,,
जिसके लिऐ ,ठुकराया"
वो क्या है,तुम्हारा,
चलो,अच्छा जब भी"
राधा कृष्ण का नाम आऐगा"
एक छवि ,प्रकाशमय होगी"
तब मन व्याकुल होगा"
अविरल,बह जाने वाली "
धारा मे,तब बेवजह यू ही"
कुछ झिलमिला जायेगा"
आँखो मे"और उन्है नाम "
दिया जायेगा "नायाब मोती "
का""""'"




           रीमा ठाकुर (लेखिका)