अक्सर गुजरता हूं मैं उस राह से
जिस राह में एक सुंदर हवेली
जिसकी नक्काशीदार दरवाजे खिड़कियां
ठिठक सा जाता हूं
रूक सा जाता हूं
खिड़की के उस पार
देखकर एक नन्ही मासूम परी को
कभी दिन के उजाले में
कभी रात के अंधेरे में
गुमसुम सी वो चुपचाप सी
अक्सर निहारती रहती है
श्वेत धवल चांदनी रात में चांद को
काली अंधेरी रात में चमचमाते सितारों को
मानो कुछ खो गया है अनंत आकाश में
यही सिलसिला चलता रहा
मैं असमंजस में खुद से ही सवाल करता रहा
आखिर क्यों नन्ही परी उदास है
ढूंढते ढूंढते जवाब मिला
जब रूबरू हुआ हकीकत से
पैरों तले जमीन खिसक गई
देखकर मासूम को आंख मेरी भी नम हुई
खिड़की के उस पार
अक्सर चांद सितारों में वो ढूंढती है अपनी मां को
अक्सर चांद सितारों में वो ढूंढती है अपनी जां को।।
वक्त कब ठहरा है
गुजर ही जाएगा
मां तो नहीं लौटा सकता मैं
बस कोशिश करता हूं परी की मुस्कान की खातिर।।
छिन लेना सारी दौलत ए खुदा
करना बस इतना सा रहमों करम
ना करना किसी को अपनी मां से जूदा
ए खुदा, ना करना किसी को अपनी मां से जूदा।।
पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏💐💐

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