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ये कहानी एक छोटे से गाँव में रहने वाली एक लड़की आशा की है। आशा, जैसा नाम वैसा ही उसका काम, हर कोई उससे जो आस लगाता आशा उसे निराश कभी नहीं करती। आशा बचपन से ही पढ़ना चाहती थी, अपने घर में पाँच भाई बहनों में सब से बड़ी आशा अपने गरीब किसान पिता से हमेशा कहा करती कि मुझे भी पढ़ना है। एक दिन आशा के पिता ने उसे गाँव के स्कूल में जो पाँच वीं तक थी दाखिला करवा दिया। आशा अपनी पढ़ाई के साथ साथ अपनी माँ के काम में भी मदद किया करती, दूसरे शब्दों में ये कहे कि हर काम में खड़ा उतरना उसे आता था। समय के साथ आशा कि पाँच वीं कि पढ़ाई पूरी हुई, गाँव से बाहर निकल कर आगे कि पढ़ाई के लिए उसने पिता से इजाजत मांगी, पिता ने कहा आशा तुम्हें तो गाँव कि रीत पता ही है, यहाँ लोग या तो बेटी को पढ़ने नहीं देते या फिर पाँच वीं पढ़ा कर उसका ब्याह कर देते हैं, हम गरीब को एक डर लगा हुआ रहता है कि बेटी को आगे कि पढ़ाई के लिए शहर भेजें, और कुछ गलत हो गया तो फिर पूरे गाँव कि बेटी से बिश्वास उठ जाएगा। मुझे बहुत लोगों ने कहा कि अब बेटी पाँच वीं पढ़ ली अब उसका ब्याह कर दो, पर मैं तुम्हें आगे पढ़ते देखना चाहता हूँ, अब तुम सही और गलत में फर्क करके आगे बढ़ो, तुम्हारे साथ तुम्हारे छोटे भाई बहनों का भी भविष्य है। आशा ने अपने पिता को वचन दिया कि उन्हें मेरी वजह से कभी शर्मिन्दा नहीं होना पडेगा। आशा अब गाँव से बाहर पढ़ने जाने लगी। देखते देखते आशा कॉलेज जाने लगी, वहीं पर उसकी मुलाकात यश से हुई और दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे, पढ़ाई के साथ साथ दोनों ने साथ साथ जीने मरने की कसमें भी खा ली, कुछ दिनों के बाद आशा के पिता ने उसकी शादी तय कर दी, आशा ने कहा कि वो अभी शादी नहीं करना चाहती है , पर उनके पिता ने कहा बेटी मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी शादी कर के निश्चिंत हो जाऊँ तो और बच्चों के जिम्मेदारी से निपट लूँ, आशा कुछ कह ना सकी। अपने और यश के बारे में भी नहीं बता सकी, उसे अपने पिता से किया गया वादा याद आ गया। अगले दिन कॉलेज में वो उदास बैठी थी, तभी यश वहाँ आ गया। यश_चुप क्यों हो आशा, क्या हुआ, अपने पिता जी से बात की, क्या बोले वो। आशा_कुछ देर यश की तरफ देख कर, यश मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उन्हें कुछ बता पाती। यश_तुम्हारी शादी पक्की हो गई,आशा_हाँ, पंद्रह दिन बाद है, इतना सुनने के बाद यश ने आशा को बहुत कुछ कहा, अपने कसमें वादों को याद दिलाया। आशा ने कहा यश मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, बताओ मैं क्या करूँ, यश ने उसे कुछ समझाया, आशा अपने घर चली आई। पंद्रह दिन बाद, आज आशा की बारात आएगी, सारा दिन घर में गीत संगीत की धूम मची है पर आशा सोच में गुम है, उसे यश की कही बात याद आ रही है। देखते देखते रात हो गई, आशा अपने कमरे में है, बाहर बारात आने का शोर उठा हर कोई बाहर बारात देखने भागा। आशा जिस कमरे में थी उसके पीछे कि खिड़की से एक आवाज आई, आशा मैं आ गया हूँ, चलो भाग चलें, तुम्हें मेरी उस दिन कि बात याद है ना, मैंने तुम्हें समझाया था कि हमलोग तुम्हारे शादी के दिन भाग चलेंगे। आशा ने कहा मुझे याद है यश, पर मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती, आज अगर मैं तुम्हारे साथ भाग गई तो आज के बाद कोई बाप ना अपने बेटी को पढ़ने देगा और ना कोई आशा कभी आगे बढ़ पाऐगी, मुझे माफ कर दो यश, मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकती। आशा कि बातें सुनकर यश ने कहा, आशा मुझे अपने प्यार पर गर्व है। प्यार का मतलब अपने माँ बाप के खिलाफ जाकर एक होना नहीं है, आशा आज तुमने अपने कदम को पीछे करके कितने ही आशा को पेट मरने से बचा लिया, अब हमारे गाँव के लोग भी तुम्हारे पिता की तरह अपनी बेटी को पढ़ने भेजा करेंगे, अब कोई भी बेटी बहन अनपढ़ नहीं रहेगी। इतना कहकर यश चला गया, आशा के दिल का बोझ भी कम हो गया और वो खुशी खुशी अपने नये जीवन के सफर पर चल दी।
श्वेता कर्ण!
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