हो गई प्रकृति ज्यों प्राणवंत
लावण्य चतुर्दिक निखर उठा!!
ऋतुराज का फैला है जादू
प्रमुदित हो कानन चहक उठा!!
रक्तिम पलाश ने बांध दिए
वन उपवन में वंदनवारे !!
उल्लसित चटकने को कलियां
सुन चंचरीक के गुंजारे!!
रस प्लावित सरिता, सर,झरने
सज गईं दिशाएं दिक-दिगन्त!!
सौरभ सुरभित बिखरे प्रसून
अभिनंदन है प्रिय तव बसंत!!
नव वयस षोडशी सी अवनि
योवन पर कुछ इतराई सी!!
प्रिय कंत, बसंत को देख रही
मुस्काई सी, शरमाई सी!!
फूलों के हार पहन सजनी
धानी धारण कर चुनरिया!!
सांसों में मलय सुगंध लिए
प्रिय के स्वागत हित बाबरिया!!
रश्मि मिश्रा "रश्मि "
भोपाल (मध्यप्रदेश)

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