आज भी याद है वो, बर्फ़ का नजारा।
बर्फ की चादर ओढ़े़ था, सोनमर्ग प्यारा।
कुछ साल पहले ,मैं कश्मीर गई थी।
कश्मीर की प्रशंसा,लोगों से सुनी थी।
कश्मीर की वादी से तो जन्नत भी हारा।प्रकृति और बर्फ का कितना सुंदर नज़ारा।
क्या प्यारा एहसास था,
बर्फ की बारिश का।
ठंड से काँपते हुए क्या, मजा था बारिश का।
कुल्हड़ की चाय के साथ,
बैठना अलाव के पास।
कश्मीर के कहवे की,क्या खूब है बात।
खिलखिलाते हँसते ,चल रहे थे लोग बर्फ़ पर। फिसलने भी लगते , बर्फ़ की पहाड़ियों पर।
कभी-कभी मैदानों में ,भी गिरते हैं ओले।
यह नजारा देख, मन हो जाता प्रफुल्लित।
जिसने न देखी बर्फ,वे मानते इसे कीमती।
जो जीते इसी के साथ,समझते इसे मामूली।
स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली

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