मन के सूने दरवाजे पर , तुम धीरे  से दस्तक दोगे?
दीप जलाकर बैठी हूं मैं , क्या तुम इसे  सजा दोगे?

शाम हो गई तुम बिन सूनी , अब तो तुम आ  जाओ।
यंत्र लिखित सीे बैठी हूं , प्रियतम को  पा हर्षा जाऊं।

मेरी  अंधियारी  रातों को, उजियारों  में बदल दोगे? 
दीप  जलाकर बैठी हूं मैं, क्या तुम   इसे सजा दोगे?

मन  हो  रहा  बहुत उदास ,आंखों के  कोरे सूने हैं।
कुछ मोहक सपने सहेजें ,जो तुम संग पूरे करने हैं।

सूखे मन की बगिया मेंं,खुशियों के पुष्प खिला दोगे?
दीप  जला कर बैठी हूं मैं , क्या तुम इसे सजाा दोगे?

तुम संग हंसना तुम संग रोना ,जीना तुम संग सीखा है।
मेरे जीवन की राहों में,कोई भी प्रिय न  तुम सरीखा है।

आशाओं के ज्योतिपुंज को , थोड़ी  सी  बढ़ा  दोगे? 
दीप जला कर बैठी हूं मैं ,क्या  तुम इसे सजा  दोगे?

जीवन का सार  तुम्हीं से है ,मेरे सारे श्रृंगार तुम्हीं  से हैं।
मेरे मन की वीणा से निकले , मधुर झंकार  तुम्हीं से है।

इन  गीतों के भावों  को तुम, सुंदर सा एक लय  दोगे?
दीप  जला कर बैठी हूं मैं , क्या तुम  इसे सजा  दोगे?
    

स्नेहलता पाण्डेय
    नई दिल्ली