†*******************†
कैसे कहूं... तुम कविता नहीं,
आराधना हो मेरी,
कविता बन उतरी,
वो कृपा प्रसाद है तेरी,
जो मुझमें बहकर निकली,
वो मात्र साधना है मेरी,
कैसे कवयित्री कहलाऊं,
ये हैं अनुसरणा तेरी,
छंद अलंकार के नियम ना जानूं,
ये मात्र संस्मरणा तेरी,
कैसे उतरी काव्य नदी ?
भीतर जैसे रसधार फूटी,
चुपचाप सी एक पुकार उठी,
मैं तो बस एक दृष्टा थी,
वो सृष्टा की एक सृष्टि थी,
वो कह रहा था मंद स्वर,
चाहे राग रागिनी ना जाने,
छंद रस के शास्त्र न‌ जाने,
चाहे तुतलाते बोल हो तेरे,
चाहे प्रशंसक हो न घनेरे,
पर किसी के शब्द भाव चुराना ना तुम,
 कभी अपनी कविता गिराना ना तुम,
बह जाये ह्रदय से अनायास बोल तेरे,
लिखना वहीं गीत मन से बहे तेरे,
कैसे कविता  कहलाऊं उसे,
ये तो कृपा प्रसाद है तेरी,
रागिनी मेरी जो मुझसे बही,
वो तेरी आराधना और
मात्र प्रतिक्षा है मेरी
वो मात्र प्रार्थना है मेरी


†****©मीनाक्षी मीरा
          रोहिड़ा (पिंडवाड़ा)        
  माउन्ट आबू   , राजस्थान