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212 212 212 212
वक्त के साथ अब वो बदलने लगे
फासले बेवजह हमसे करने लगे
वो जो कहते थे हम है तुम्हारे सदा
आज वादे से अपने मुकरने लगे
कोई अब इस गली से गुजरता नहीं
ये चिराग़ ए वफ़ा ख़ुद ही बुझने लगे
याद में जिनकी ये ज़िन्दगी काट दी
अब वो मेरी नज़र से उतरने लगे।
कैसी फितरत हुई आज इंसान की।
आदमी आदमी से ही लड़ने लगे।
तेरे चाहत में पलते रहे ख्वाब जो।
बेरुखी से तुम्हारे बिखरने लगे।
मेरी बर्बादियों की तू परवाह न कर
खुद ब खुद ज़ख़्म मेरे ये भरने लगे
मेरे दिल में जो रहते खुदा की तरह
अपना कहने से उनको हम डरने लगे
लग न जाए ज़माने की हमको नज़र
सोच कर बात से हम दहलने लगे
मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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