जब हम नये शहर में थे आये,

तब हमको भी हम पुराने अच्छे नहीं लगे,

और नये होने की चाह में न जाने ऐसे भगे,

की हो गयी गलती , और पापो में पगे।

देर- सवेर जब कभी विवेक से थे जगे,

खाकर ठोकर बहुत कुछ समझ ने थे लगे,

तब पस्तावा और आँसू ओ का ढेर था,

न जाने दर्द , बेहद और कितना बेमेल था,

माना था जिसे हमदर्द उसी का दिया हुआ दर्द था,

एक लिए प्यार तो, एक के लिए सिर्फ जिस्म का खेल था।



उस वक्त को तो मेने जेसा मन करा वेसे जी भर के जी तो लिया था, पर उसका भारी पन इतना था की, में अपनी नजरो में, फिर कभी उठ नहीं पाई |


अभी तो यह पहला पेज ही पढ़ा था की झटके से तानिया के हाथ से यह डायरी छीन ली गयी...

तुमने ये डायरी क्यों निकाली?? कितनी बार मना किया है तुमको ... गुस्से से बोलते हुए माँ रागिनी ने एक बार फिरसे अपनी बेटी को डांटा...

माँ आप हर बार एसा क्यों करते हो ? एसा क्या है इस डायरी में ? में क्यों नहीं पढ़ सकती ?

प्रश्न मत पूछो , समय आने पर में खुद सामने से दूंगी , अभी तुम छोटी हो अपनी दसवी की पढाई पर ध्यान दो... और इतना कहते हुए माँ चली गयी ...

तानिया पढाई की किताब खोल के तो बेठी पर पढाई में मन लगा नहीं .. अब वो इतनी भी छोटी नहीं थी , वो लिखी लाइने उसके दिमाग में घूम रही थी , क्या पता ये किसकी कहानी है और क्या हुआ इसके साथ ... उसको बार बार डायरी के आगे के पन्ने पढने का मन हो रहा था, पर पता था माँ ने फिर से लोकर में रख दी होगी और अब तो उसकी चाबी की जगह भी बदल दी होंगी ... तभी उसको अपनी प्यारी और स्मार्ट friend पलक की याद आती है .... तुरंत मन बहलाने , तो कही ध्यान उसमें लिखी बातो से हटाने तानिया अपनी सहपाठी खास सहेली के घर चली गयी ...


क्या हुआ ? क्यों उदास है ? पलक एक बार फिरसे तानिया के मूड को समझते हुए पूछती है ..

इस बार तानिया अपनी सहेली से जुठ नही बोल पाती और सब विगत से बात बताती है ...

देख , आंटी क्यों मना कर रहे है , वो तो पढने के बाद ही पता पड़े पर अगर तुझे पढना है तो एक आईडिया है मेरे पास ..

क्या ? एकदम आँखों में चमक के साथ मुझे पता था स्मार्टी , तेरे पास जरुर कोई रास्ता होगा ..

चल जूठी , अगर इतना विश्वास था मेरी बुद्धि पर तो बताने में इतनी देर क्यों की ??

सॉरी बाबा , चल आईडिया बता ?

जा माफ़ किया , हा..हा , सुन अब .... वो पारस है न अपना क्लासमेट,
"हाँ वहीं जो तेरे पीछे पड़ा है!" 

हो गया तेरा...अब सुन भी...

"हाँ सॉरी, अब बता भी''

उसके पापा चाबी बनाने का कार्य करते है , मेरी मम्मी ने हमारे घर के लोक की नकली चाबी वही से बनवाई थी ... मुझे अच्छे से जानते है , फिर दोनों मिलकर प्लान करते है ....
(प्लान के मुताबिक सफलता हासिल कर ही लेते है...लोकर का नाप सब लेकर दूसरी चावी से उस डायरी को निकल लेने में...)

थैंक्स पलक अब मुझे शांति मिलेगी ... पर में इसे रखु कहाँ ?

रुक इसकी ज़ेरॉक्स निकाल कर अपन वापिस लोकर में रख देंगे जिससे आपकी मम्मी कभी देखे तो पता न पड़े की अपन इसे पढ़ रहे है |

वाह ! बहुत सही बात कही... और प्लान के मुताबिक सब सही हो गया ....

तानिता रात को मोका देख कर , जब सब गहरी नींद में सोये होते है, तब डायरी निकलती है , और आगे पढना शुरू करती है ...


केसे भूल सकती हु मेरी इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रथम दिन जब नताशा ने साहिल से मिलवाया था...

रागिनी इससे मिलो ... ये हे साहिल मेरा फियान्स ... हम दोनों की सगाई हो चुकी है पर शादी की जल्दी नहीं है ... ये अपना सिनिअर है क्युकी इसका इंजीनियरिंग का सेकंड इयर चल रहा है ...

और साहिल ये हे मेरी नयी रूममेट रागिनी , ये भी मेरे साथ कंप्यूटर साइंस में ही है ...

ऋषिकेश के टेकरी से जाने जाते पहाड़ी एरिया वाले गाँव से इंजीनियरिंग करने यहाँ दिल्ली आई है ... माना अपने जेसी फॉरवर्ड नहीं है पर जितनी ये खुबसुरत है उसका मन और स्वभाव भी उतना ही सुंदर है ...

सही है ... उपर से निचे तक उस पर एक नजर डालते हुए , पिंक और येलो पटियाला ड्रेस , घुटने से भी लम्बे पर गूँथ हुए बाल , आँखों में लज्जा और भोलापन साथ स्किन फेयर एक यूनिक पेर्सिनाल्टी दे रहा था ... सादगी में सुन्दरता यहाँ देल्ली की कॉलेज में पहेली बार देखी... कहते हुए साहिल ने हाय करते हाथ मिलाया ...

रागिनी ने शरमाते हुए , जी हाय ! पर हम लडको से हाथ नहीं मिलाते ...

ok, Cool....

इतने में ही रोहन और आकृति आते है ... हेल्लो guys,

आकृति और नताशा गले मिलते है , रोहन भी नताशा से साइड hug करता है .... इसी तरह साहिल और आकृति भी मिलते है ...

रागिनी बहुत उन्कोम्फेर्ट फील कर रही थी ,, उसके वहाँ कभी ये सब तौर तरीके देखे नहीं थे ...

तभी इस बार साहिल ही रागिनी से सबको introduce करवाता है और अच्छे से बता देता है की वो इतनी बोल्ड या फ्रैंक नहीं है बाकि शहर की लडकियों की तरह....

बस थोड़े गप्पे तो थोड़ी मस्ती और वही केंटिन की कोफ़ी और सेंडविच खाकर सबकी मुलाकात का अंत होता है ... और नताशा के साथ में अपने रूम पर आ गयी ....

तो बस ये था मेरा आज का कोलेज का प्रथम दिन 2/7/2003

मुझे आज घर की बहुत याद आने लगती है ,

माँ से कॉल पर थोड़ी बात करके थोडा मन हल्का हुआ और बस लेटे लेटे उसको वो जब घर से निकली उस दिन की याद में खो जाती है ....

केसे में 1 जुलाई रविवार के दिन पढाई करने घर से दूर आने निकली थी ! गाँव की ही तो थी आखिर वहां पढाई का कहाँ इतना महत्त्व है ही , ये तो शुक्र है बाउजी ने माँ को मनाया , नहीं तो माँ का मन तो मेरी शादी ही करवाके ससुराल विदा कर ने का था ... खैर जो भी हो आखिर दिल्ही शहर ने बुला ही लिया ...


माता पिता ने बड़ा कुम कुम का टिका कर , दही और शक्कर खिलाकर, गले में बड़ी गेंदे के फूल की माला पहने बड़े शुभ मुहूर्त देख कर वही गाँव के रीती रिवाज पूर्वक घर से विदा किया था। पहेली बार घर से दूर भेज रहे थे , फिर भी कूछ लक्ष्य को ध्यान में लेकर निकली थी इसलिए माता पिता की आँखों में खुशी के आँसू थे। मेने भी चरण छू कर साथ कोने में लगी गणपति बाबा की फ़ोटो को हाथ जोड़कर, मेरे पडोशी के गाँव गंगा के दो और साथियों के साथ मंजिल का सफ़र तय करने निकल पड़ी, पर इन दोनो का मेरे कोर्स और मंजिल से कोई लेना देना नहीं था, मुझे मेरी मंजिल का सफ़र नए लोगो के साथ अकेले ही तय करना था जिसके लिए में पूरी तैयार थी । ये शहर की दुनिया मेरे गाँव से काफ़ी अलग थी। मेरे लिए तो किसी परदेश से कम नहीं थी ।

आज का प्रथम कॉलेज का दिन , सबकी फेशन , स्टाइल , मूवी , प्यार व्यार की बाते तो कही टेक्नोलॉजी की बाते सब वो समझने की में कोशिश कर रही थी ... कई शब्द के अर्थ तक पता नहीं पड़े वो तो अच्छा रहा नताशा साथ थी , जिसने सब समजाया... वाकई में नताशा एक अच्छी और प्यारी सहपाठी है ... बाकि सब के बारे में अभी कुछ लिखना नहीं चाहती ... बस आज इतना ही ....

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पढ़ते पढ़ते तानिया को भी नींद आ गयी ...सुबह एलार्म बजने से उसकी नींद टूटी ..

फटाफट स्कूल के लिए रेडी होकर रवाना हुई ....

(स्कुल में )

तो कल पढ़ी डायरी ?? पलक भी जिज्ञासा से पूछती है ,

हाँ यरर ... यहाँ तक एसा सब पढ़ा है ....

तो ये कहानी आपकी मम्मी की है ?

हाँ पलक लग तो मम्मी की ही रही है ....

आगे क्या है ?? चल यार् बंक मारते है , वेसे भी मिश्रा सर के मैथ्स के लेक्चर में कुछ पल्ले तो पड़ना नहीं , इससे अच्चा tution में सिख लेंगे ....

पर सर ने पकड लिया तो? तू ये मत भूल की मिश्रा सर स्कुल के वाईस प्रिंसिपल है... तानिया ने थोडा भय भीत होते कहाँ ...

(इतने में ही पारस और केशव आते है ...)

आप दोनों अभी तक ग्राउंड पर ही हो , चलो रिसेस टाइम खत्म हो गया ... पारस बोला ...

हाँ , आज हम लोग नहीं अटेंड कर पाएंगे ... प्ल्ज़ कुछ बताना मत, हमारी इतनी सी हेल्प कर देना ...’

पलक तुम कहो और पारस न करे एसा भला हो सकता ? केशव ठहाके मार बोला ...

अब जाओ भी , आप लोग ...समय हो गया क्लास शुरू न हो जाए ! पलक बिच में ही इगनोर करते हुए बोली ....

और दोनों के जाते ही पलक के साथ तानिया ने ग्राउंड के कोर्नर वाले पेड़ के निचे बेठ आगे की कहानी पढना शुरू की .....

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जीवन ने नोर्मल तरीके से रफ़्तार ली है , रोज तो लिख नहीं पाती विगत से बड़े दिन बाद आज बुखार के कारन कोलेज नहीं गयी तो आगे लिखने का कलम को मोका मिल गया ,,, पढाई में मन से व्यस्त हो गयी थी में ... क्लास में एक सिंसिअर लड़की की इमेज बना ली थी मेने .... और तो और वही दोस्तों का ग्रुप जो शुरू में मुझे उन्कोम्फेर्ट लग रहा था अब में धीरे धीरे उसमे भी घुल मिलने लगी हूँ... पूरी तरह तो नहीं पर काफी अंश तक ... तो कही वो लोग भी मुझे अब समझने लगे है , और मुझे भी कम्फर्ट फील कराने की कोशिश करते थे .... धीरे धीरे कुछ हद तक उन लोगो ने मुझे तो कुछ तक मेने उनको एक्सेप्ट कर दिया था ... कुछ सिनिअर तो कुछ दोस्त भी अब मुझे जानने लगे थे ... हलाकि की मेरा रहन सहन देख कुछ सिनिअर लोगो ने मेरा नाम बहेनजी ही रखा था पर मेरे सामने मुझे कहने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी क्युकी एक सिनिअर दोस्त साहिल जो था ... सिनिअर का दोस्त होना काफी लाभप्रद होता है , वेसे मुझे बहनजी शब्द से ज्यादा फर्क कभी नहीं पड़ा था पर शायद साहिल ही इसे सुन नही पता था .... खैर कुछ भी कहो साहिल ने एक अनोखी जगह बना ली थी मेरे दिल में ... J 

उस नवरात्री वाले दिन भी उसीने तो सबको मनाया था अगर वो फेवर नहीं करता तो व्रत पालना बड़ा कठिन था , हाँ मेरा हर बार के जेसे दुर्गा माँ का व्रत था .. वही नताशा की सिल्वर एक्टिव पर हम सवार होकर कोलेज पहुंचे ... 

“तो आज पार्टी रागिनी देगी “ रोहन बोला

हाँ इसीका टर्न है आज तो .... आकृति , नताशा सब ने साथ देते हुए बोला..

सॉरी पर आज मेरा उपवास है , में फलोपवास करती हूँ ... मेने थोडा जुन्ज्लाते हुए कहा...

फिर क्या जेसा मुझे भय था सब बहुत हसे .... छोडो ये सब क्या करना ... किसके लिए भूखी मरोगी पुरे दिन ?? वो भगवान् जो किसीको दीखते ही नहीं ,,,,

बुजुर्ग या आंटी लोग करते है अभी अपन तो जवान है ,,,,

अपनी उम्र तो मौज मस्ती की है और सब ठहाके मार हंसने लगे ....

में बहुत शर्म महसूस कर रही थी... कुछ बोल नहीं पायी बस आँखे झुका ली..

साहिल ये देख नही पाया और क्रोधित होते बोला ... वाह ! क्या जमाना आ गया .. जो भगवान का नाम ले रहा है उसे आज निचे जुकना पड़ रहा है ,,, अपन तो नास्तिक है कुछ करते नहीं है , पर जो इतना कर रहा है उसकी कमसे कम मजाक तो न बनाये ... वेसे भी अपन अच्छे से जानते है की रागिनी किस माहोल से आई है !

तब सब ने मेरी माफ़ी मांगी और तो और 9 दिन तक कोई पार्टी नहीं हम सब भी रागिनी के साथ पूजा करेंगे ...

फिर क्या मेरे चहेरे की रोनक ही बदल गयी ... ये तो एक छोटी सी बात है , एसी कई खुशियों की वजह बना था साहिल ...

मेरे जीवन के हर पहलु ओ में साहिल का जो साथ था वो अनोखा था ... वो भी मेरे लिए इतना सब क्यों कर रहा था नही पता था ... सच में नताशा कितनी खुश किस्मत है उसके पास साहिल जेसा हमसफ़र है , मुझे नहीं पता में साहिल से प्यार करने लगी थी या नहीं पर उसके जेसे जीवन साथी को पाना अवश्य चाहती थी ....

हलाकि काफी पर्सनल और अब तो साहिल के बारे में मेरे दिल की बात लिखी दी है इसलिए अबसे डायरी को छुपा कर लोकर में रखना शुरू कर दूंगी ... कही नताशा इसे पढ़ कर बुरा न लगा ले ... बाकि मेरे जीवन के और डायरी के कई पन्नो से नताशा वाकिफ थी , और होती भी क्यों नहीं ... ये अनजान शहर में जब से पैर रखा तब से एक वो ही तो मेरा सब कुछ रही ... उसी के दोस्त तो मेरे दोस्त बने ... और उसकी गाड़ी पर दिन रात घूमना , कभी कोई भी हेल्प हो हमेशा रेडी ... अभी बुखार है तो वो एक नानी अम्म्मा बन कर मेरा ख्याल रख रही है ... शायद इसकी दोस्ती साथ बहुत अहेसान के नाते भी में साहिल को उस नजर से देखना नहीं चाहती हूँ ...बस आज इतना ही ...

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तो बस आज अपन भी इतना ही रखते है, साइंस का पिरिअड़ शुरू होने को है ,,, पलक भी समय देख कर बोली..

हाँ , सही पर मुझे इसे पूरा पढ़े बिना चैन नहीं आएगा ... तनिया ने कहा ...

“तो घर जा कर पढ़ लेना , अब साइंस का लेक्चरर भी अटेंड नहीं किया तो पकडे जायेंगे” ...

सही है , क्यों न अपन कोने की बेंच पर बेथ कर बड़ी किताब के अन्दर छुपा कर पढ़े ...

“ये आईडिया सही है .... चल पहेले तो चुपचाप क्लास में चलते है ... नमिता मेडम आते ही होंगे” ....

पर एक प्रॉब्लम है ,

“क्या ?”

बार बार पारस की मुड मुड़ कर अपनी तरफ़ देखने की आदत की वजह से कही फस न जाए .... कही कुछ गड़बड़ हो गयी तो ? पूछेगा क्या कर रहे थे तो ?

“अरे ! उससे डर ही मत तानिया में समझा देती हु वेसे भी उसे ...”

जेसे ही दोनों क्लास में आते है , तुरंत पारस चिपकू के जेसे आ जाता है...

तो पलक ये तो बता मेरे पापा के पास आप दोनों अकेले परसों क्यों गये थे ?

दोनों चिंतित हो कर एक दुसरे का मुंह देखने लगते है , केसे क्या पता पड़ा इस पगले को , ये आज तक न्यूज़ है सब जगह फैलाएगा ...

“क्यों रे तुजे क्या बतया अंकल ने ?”

अरे... दुकान के सामने की ही बिल्डिंग में घर है न , तो मेने ऊपर से तुम दोनों को देखा था , में भागा भागा आता तब तक तो आप दोनों चले भी गए ....

इतने में ही मेडम आ जाते है ...चलो बाद में बात करते हे ...करके सब अपनी बेंच पर बेठ जाते है ...

तय के मुताबिक अंतिम बेंच पर बेठ, डर लगते हुए भी पर जानने की इच्छा के कारण दोनों आगे पढना शुरू करते है...

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अब नताशा लगभग रूम पर होती है तो कही एकांत नहीं मिलता इस लिए लम्बे समय से कलम ने शब्दों से डायरी के पन्नो को सजाया नहीं , पर आज एक महीने बाद में इसे लिख रही हूँ , ये एक महीने ने तो मेरे जीवन की काया पलट ही कर दी साथ मेरे काया की भी काया ... हाँ अब में गाँव की वो सादगी वाली लड़की नहीं रही थी ... में भी जींस , शॉट्स , वहा तक की वन पिस भी पहनने लगी थी .... और ये बदलाव लाने वाला भी साहिल ही था ....

मेने लाख चाहा की में साहिल को न चाहू , पर प्यार किया नही जाता बस हो जाता है , मुझे भी हो गया ... मेरे बस में भी अब मेरा दिल नहीं रहा , न जाने कब मेरी धड़कने साहिल की धुन गुनगुनाने लगी ,,, पर बस नताशा को सोचकर इस दिल की बात को जुबान पर नहीं लाई... पर अपने आप को इस लिए ही बदला की साहिल को पसंद आ जाऊ ... पता नहीं पता होते हुए भी की वो किसी और का है में अपने आप को उसकी पसंद बनाना क्यों चाहती थी ??

पर वाह रे किस्मत तू उस दिन तो मेरे पर महेरबान हो गयी ...

वक्त ने मोड़ तो तब बदला जब एग्जाम के समय में और नताशा, साहिल के घर पढने जाने लगे ... नताशा उस बहाने साहिल के साथ वक्त गुजारने मिल जाता और मुझे मेरी नोट्स ... वेसे नोट्स तो एक बहाना था ... पर अब तो में भी साहिल को देखने ही तो जाती थी .. केसा सब बदल गया था , पहेले में ही थी जो साहिल और नताशा को मिलन में मदद करती थी ... में ही थी जो खुल के नताशा को कहेती थी जा बंक कर दे लेक्चर में पढ़ा दूंगी ...घूम ले साहिल के साथ ... पर अब वो में ...नहीं रही ... अब तो में नताशा से मन ही मन कोम्पिटीशन करने लगी थी , वो साहिल से चिपक कर बैठती तो मेरा जी जलता था ...

इश्क छूपता नहीं छुपाने से ... सही है यह लाइन... और साहिल समझ चूका था मेरे दिल में उसके लिए क्या है !! आखिर एक दिन साहिल ने मुझे अकेले में मिलने बुलाया ....उसने मुझे प्रपोस किया ! मुझे यकीं ही नहीं हो रहा था , मेरे से भी रहा नहीं गया और मेरी सारी फीलिंग कह डाली ... और उसको लिपट के बहुत रोई ... में नताशा को भी धोखा देना नहीं चाहती थी और साहिल को खोना भी नहीं ... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था जिंदगी ने ये केसे मोड़ पर लाके रख दिया था ... साहिल मुझे सम्हाला ... और कहाँ वो भी सिर्फ मुझसे प्यार करता है ... पर साहिल अब तक दोनों को सम्हाल ने लगा ... नताशा को कुछ तो अजीब लगता था पर होगा कुछ करके उसने भी ज्यादा सोचा नहीं ....और में ?? कहते है न प्यार अँधा होता है , सच में होता है जिसने मेरी विवेक आँखों को भी नाद कर दिया था तभी तो में भी कुछ सोच न पाई ....

इस तरफ मेरा तो साहिल के प्रति पागलपन था ही उसने इसका एक दिन फायदा उठा ही लिया मुझे समझा बुझा पटा के तो कही बुद्धू बना के ही सही ... हम दोनों अकेले में मिलने लगे ... उसने मुझे एक बार सेक्स करने के लिए कहा ... मेने मना कर दिया , साहिल ये सब शादी के बाद ...

क्या नताशा और तुम्हारे बिच कभी सेक्स हुआ ?

हाँ यार , वो मुझसे प्यार करती है ... और प्यार में ये सब होना सहज है ...

क्या तुम नहीं करती हो ? उसने प्रश्न मेरे प्यार पे किया... मेरी कुछ समझ में आये उसके पहले उसने मुझे बहो में ले लिया ,

सोचो यहाँ कमरे में अपन दोनों को आलावा कोई नहीं है ... और वो मेरे होठो को चूमने लगा ... , उसके हाथ सरक के मेरे अंग अंग को उकसाने लगे थे, आखिर थी में भी एक लड़की , फीलिंग्स को कहाँ तक दबाती और उस दिन मेने उसके साथ वो सब किया जो एक लड़की सुहागरात के दिन करती है ...

तब नया नया प्यार था समझ ही न पायी की साहिल का प्यार तो सिर्फ जिस्मानी था ... रूम पर तो नताशा से नज़रे नहीं मिला पा रही थी ... मुझे नताशा को धोखा देने का बहुत दुःख हुआ और मेने उसे सब बता दिया ... तब उसने मुझे बताया की में बुद्धू लड़की ने कितनी बड़ी गलती कर दी है ... हर लड़के को लड़की से सेक्स चाहिए होता है , उसने उसका फोन दिखाया , जिसमें कई बार साहिल की तरफ से होटल में मिलने की ऑफर को या सेक्स की ऑफर को नताशा ने स्वीकार नहीं किया था ... वो बोल्ड थी पर केरेक्टर लेस नहीं , तब मुझे मेरी भयानक गलती का अहसास हुआ ... मन पश्चाताप और ग्लानी से भर गया ... पर अब क्या ? नताशा ने हिम्मत दी ... एक साथ दो लडकियों को धोखा देने के के आरोप में हम दोनों ने उस पर fir पुलिस में दर्ज करायी ... पुलिस अभी तक तो साहिल का पता नहीं लगा पायी .... वो बिना बताये ही गायब हो गया था ... खैर उसने तो कुछ घुमाया नहीं था , पर में ? मेंरी कीमत कोडी की भी नहीं रही , एक बार शील पर दाग लग जाने के बाद लाख पस्तावे के बावजूद भी वो मिटाए नहीं जाते .... पता नहीं क्यों में समझ नहीं पाई की साहिल मेरी ही क्यों इतनी मदद कर रहा ? कमजोर लोगो को मदद कर के जीता जाता है , मेरे पास सब होते हुए भी मन से अपने को इन लोगो से अपने आप को कम आंकने लगी थी ... भूल चुकी थी मेरे संस्कारों की वसीहत सबसे बड़ी थी और में इन सब से कम नहीं थी ... खैर ठोकर खाकर सिख ले ही ली है मेने .... जिन्दगी का दूसरा नाम ही समजौता है जो मेने किया ... पढाई पूरी कर घर लौटी , माता पिता को कुछ पता नहीं था वो बिचारे गाँव के भोले लोग ... मेने भी उसे बुरा सपना समझ भूल गयी ... माता पिता ने कहा वहां शादी कर ली और बेंगलोर आ गयी स्वदेश के साथ सात फेरे लेकर ... हाँ उसका नाम स्वदेश है ... बचपन में सातवी तक गाँव में साथ ही तो पढ़े थे हम दोनों ... स्वदेश बहुत अच्छा है मुझसे बहुत प्यार करता है लग रहा है में अब साहिल के जख्म भूल जाउंगी,, वेसे भी जूठा, कपटी वो था, में नहीं और सब जानते है ,” ठगना पाप है ठगाना नहीं “ और तो और किस्मत की महेरबानी रही की ये बात स्वदेश ने भी समझी ...

... मेने अपने आप को माफ़ कर दिया पर साहिल को नहीं ,,, मुझे आज भी उसकी तलाश है ... अब नताशा भी किसी इंजिनियर से शादी करके फोरेन सेट हो गयी ... रोनक और आकृति की भी शादी हो गयी .... आखिर हैप्पी एंड हो गया बहुत सारे सबक और समजौते के साथ .... 

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पलक और तानिया के गिरते आंसुओ से सारे पन्ने भीग चुके थे ,,,

तानिया के मन में कई सवाल पैदा होते है ...

में समझ सकती हूँ तुम अपने पापा के बारे में सोच रही हो न ?? पलक ने तानिया को गले लगाते हुए पूछा ...

हाँ , माँ ने आज तक नहीं बताया मेरे पापा कहाँ है, और हमारे साथ घर पर क्यों नहीं ?

इसमें मेरे पापा का कोई जिक्र नहीं है ... आज में और माँ सिर्फ अकेले क्यों है इतने बड़े घर में ?? बाद में क्या हुआ ?

ये तो तुजे तुम्हारी माँ ही बता सकती है ....

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माँ हमने वो डायरी पढ़ ली ....

माफ़ कर देना माँ आपकी अनुमति के बिना ये कदम उठाया पर .... अब मेरे मन में उठ रहे सवालों की आग को आप सत्य बता के शांत करो ...

बेटा पलक , में तुम्हे बहुत कुछ बताने वाली थी बस सही समय का इंतज़ार था मुझे .... तुम्हारी दसवी की महत्त्वपूर्ण पढाई में कोई हानि न पहुंचे साथ तुम बड़ी और समझदार हो जाओ ...

बिच में ही बात कटते हुए ,, माँ में समझदार हूँ अब बच्ची नही रही ... प्ल्ज़ बताओ माँ फिर क्या हुआ ?? मेरे पापा कौन है ?

तो सुनो , स्वदेश नही साहिल है , हाँ , साहिल ही तुम्हारे पापा है .... शादी भले ही स्वदेश से हुई है ... पीछे 7 साल से वो विदेश है दो महीने बाद हमेशा के लिए आ जायेंगे अपने पास ... में और वो मिलकर तुम्हे सब बताने ही वाले थे ....

अच्छा !!

हाँ बेटा , जब उस रात मेरे और साहिल के बिच सब कुछ हुआ उसके बाद में प्रेग्नेट हो गयी ... मेरी कोख में तुम आ गयी थी ,पर बिना शादी समाज के बिच तुमको जन्म देना संभव नहीं था , अस्वीकृति के साथ बदनामी की बरसात होती इस लिए नताशा ने मेरी मदद की ... ग्रेज्युएष्ण तो पूरा हो ही गया था, जब घर वापस आई तो माता पिता ने बिरादरी में रिश्ता देखे रखा था ...और दोनों फेमिली के मुताबिक हमारी मीटिंग और उसी दिन सगाई हो गयी .... में पढ़ी लिखी थी इसलिए स्वदेश ने मुझे पसंद किया था .. वो CA था और बेंगलोरे रहता था ... शादी के बाद मुझे उसके साथ वही रहना था ... में और वो बचपन के दोस्त रहे है ... मेने उससे कुछ नहीं छुपाया , नताशा ने भी मेरा सपोर्ट किया , साथ और हिम्मत दी ...

सब सुनने के बाद स्वदेश ने एक ही प्रश्न पूछा क्या तुम साहिल को ढूंढना चाहती हो साथ बच्चे को जन्म देना चाहती हो ?

मेने कहाँ , साहिल तो उसी वक्त मर गया था जब उसने मेरे प्यार का इस्तेमाल किया मेरा विश्वास तोड़ा ... कुछ समय तक तो में उसे सज़ा दिलवाने के लिए ढूंढना चाहती थी पर अब वो बस भूल कर आपके साथ आपको समर्पित रहके आगे बढ़ना मात्र चाहते है हम,और रही बात बच्चे की तो , हाँ में इस लिए इसे जन्म देना चाहती हूँ क्युकी में खुनी नहीं बनना चाहती ....और ये साहिल की निशानी नहीं ये मेरा अपना बच्चा है , पर आप कहेंगे वैसा ही होगा।

सही कहाँ यह अबसे अपना बच्चा है। साहिल के नाम तक का साया इस पर कभी नहीं पड़ने देंगे। बस यही बोला तब तुम्हारे पापा ने... उसी के चलते तुमको कभी कुछ नहीं बताया पर जख्म चाह ने से कहाँ मिटते है और उसीके चलते कुछ बोल नहीं पायी...

में स्वदेश का इतना सपोर्ट पाकर अपनी ही किस्मत पर अभिमान कर रही थी। 

कुदरत ने मेरे साथ या , यु कहो मेरे बचपने, ने मेरे साथ बड़ा खेल खेला था पर स्वदेश को मेरे जीवन में सामिल कर मानो मुझे कृतकृत्य कर दिया .... कहते है न तपन के बाद बारिश होती है , या कुछ नहीं मिलता तो, उससे और अच्छा मिलना होता है बस एसा ही है अपने जीवन में ....

एक बात हमेशा ध्यान रखना बेटा , जो तुम्हे सच्चा प्यार करता होगा वो तुममें कभी बदलाव नहीं चाहेगा, वो तुमको जेसे भी हो वेसे स्वीकार करेगा और तो और प्यार की शुरुआत शारीरिक कभी नहीं होती...!!

ओऊ माँ , और गले से लिपट जाती पलक अपनी माँ से......love you माँ ..



                 ✍️ *प्रियंका (पंखी)*