तकलीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं,
बल्कि जिंदा होकर भी, लोग कहां जीते हैं।
आज जीते हैं, इक बेहतर कल के लिए
कल फिर जीते हैं, इक बेहतर परसों के लिए
बल्कि क्यों, लोग अपने आज में नहीं जीते हैं
तकलीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं
बल्कि जिंदा होकर भी, लोग कहां जीते हैं।
न कोई सच्चे रिश्ते, न कोई अपने
नातों की भीड़ सी, पर सब सपने
इक झूठी सी जिंदगी, हर रोज जीते हैं
तक़लीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं,
बल्कि जिंदा होकर भी, लोग कहां जीते हैं।
न किसी से गम, न किसी बात से ख़ुशी,
चेहरे पर जरुरी, इक बनावटी सी हंसी,
क्यों ये खोखली सी जिंदगी, हर रोज जीते हैं।
तक़लीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं,
बल्कि जिंदा होकर भी, लोग कहां जीते हैं।
मोल बस बेजान चीजों का, उन्हीं की कीमत,
उन्ही के लिए मेहनत, बस उन्ही की हसरत,
ये अंधी दौड़ की जिंदगी, हर रोज तय करते हैं।
तक़लीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं,
बल्कि जिंदा होकर भी,लोग कहां जीते हैं।
खुद की बनाई उलझनों में, अक्सर उलझा है,
ये किस्मत का किस्सा भी, किससे सुलझा है,
रह जाती हैं, कहीं न कहीं अधूरी,
क्यों..?,उम्मीदों की चादर बड़ी लंबी बुन लेते हैं।
तक़लीफ इस बात से नहीं, कि लोग मरते हैं,
बल्कि जिंदा होकर भी, लोग कहां जीते हैं।......
........✍️🙏🌄 ऋतु बाजपेई

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