ओ मेरे पापा 
मै भूली नही उन 
पानी की बूदो को अभी तक 
जो चुपके से आपने 
छुपकर पोछ लिया था ।

और हँसकर विदा किया था 
जैसे आप छिपा रहे थे वो आँसू 
मै भी अंजान बन कर ,अनदेखी कर रही थी 
आपकी बेटी ,आपको समझ गयी थी 

ये जो  शान से हँसकर विदा करते हो 
सब झूठ मूठ का नाटक करते हो 
दो बूद पानी नही ,छिप कर रो लेते हो 
क्यो छुपाते हो हमसे भला ।रोक लो 
दुनियाँ की रस्म मत निभाओ ।

उन आँसुओं की खातिर तो 
सब झेलकर भी हारते नही हम, और
जीत जाते आपके दिये संस्कार सभी 
जब हर परीक्षा मे खरी उतरकर मै 
खुशी के आँसू झलकाती हूँ ।



               मीनाक्षी शर्मा