दोस्त! एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर ही मन खुश हो जाता है। जब भी किसी के पास भाई बहन की चर्चा करो तो वो ये जरूर पूछ बैठेंगे कि कौन सा भाई या बहन। पर दोस्त का कोई परिचय नहीं होता। दोस्त दोस्त होता है। जब कोई मुसीबत में होता है तो कुछ देर के लिए तो उसके रिश्ते नाते वाले भी मुंह मोड़ जाते हैं पर जब दोस्त को पता चलता है तो वो अपने दोस्त से बहुत नाराज होता है और उसके मुंह से यही निकलता है कि तुमने मुझे पराया समझा। तुमने मुझे एक बार भी बताने की कोशिश नहीं की। ऐसा होता है दोस्त। 

ये कहानी दो दोस्त अनुपम और शेखर की है। अनुपम के पिता गरीब थे लेकिन उनकी कोशिश थी कि बेटा किसी तरह पढ़ लिख जाये, पर वो अनुपम कि पढ़ाई का खर्च भी पूरी तरह से नहीं निकाल पाते। ऐसे में अनुपम का दोस्त शेखर अनुपम की हर संभव मदद करने की कोशिश करता कयोंकि वो गाँव के प्रधान का बेटा था। दोनों की दोस्ती पूरे गाँव में मशहूर थी। कितने ही बार ऐसा हुआ कि जब अनुपम को कभी कोई जरूरत होती तो उसे शेखर से मदद माँगने में संकोच भी होता तो शेखर बिना कहे ही पूरा कर देता। वैसे भी दोस्ती में ये कहावत तो मशहूर है कि माँगा भी उसी से जाता है, जो खुशी से दे दे और किसी से ना कहे। 
एक बार कि बात है, स्कूल की पढ़ाई खत्म होने के बाद सब  कॉलेज में नामांकन कराने  जा रहे थे। शेखर ने अपना नामांकन शहर के बड़े कॉलेज में करवा लिया। इधर अनुपम को साधरण से कॉलेज में भी नामांकन के लिए पैसे नहीं थे ऐसे में उसे शेखर से रुपये माँगने में भी संकोच हो रहा था। उसने सोचा कि मैं अब पढ़ाई नहीं करूँगा और कमाने शहर चला जाऊँगा ताकि पिता जी की कुछ मदद कर सकूँगा। इधर जब शेखर ने देखा कि अनुपम ने अपना नामांकन कहीं नहीं करवाया तो, शेखर अनुपम से मिलने उसके घर गया और अनुपम से पूछा कि तुमने अपना नामांकन क्यों नहीं करवाया, तो अनुपम ने उसे अपनी परेशानी बताया और कहा कि मैं कहाँ से पढ़ाई करूँ मेरा तो घर भी ठीक से नहीं चल पाता है। 

                     शेखर ने अनुपम को कल कॉलेज में मिलने को कहा। दूसरे दिन कॉलेज में शेखर ने अनुपम को पैसे दिये और कहा तुम अपना नामांकन करवा लो और अच्छे से पढ़ाई करो। दरअसल शेखर अपने घर जाकर अपनी माँ से सारी बातें बताइ। शेखर की माँ ने कहा बेटा! मुसीबत के वक्त ही सच्चे दोस्त की पहचान होती है और उन्होंने शेखर को पैसे दिये और अनुपम की मदद करने को कहा। अनुपम ने अच्छे नम्बरों से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। शेखर भी कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद विदेश में नौकरी कर ली। अनुपम भी अपने शहर में ही अच्छे पद पर है। आज दोनों दोस्त एक दूसरे से बहुत दूर रह रहे हैं लेकिन, दोनों के बीच आज भी दिलों की दूरी नहीं है। 
                                           दोस्ती ,जात पात, मजहब और हैसियत से ऊपर होती है। 


                  
                     श्वेता कर्ण