भटकती आत्मा, जो वही इंसान
जिसे जग में,ना अपनों की पहचान ।
झूठ-सच को, परख ना पाए
यह अपने को इंसान कहलाए ।।
भटकती आत्मा ,जो वही इंसान
तृष्णा, विलासिता तेरी पहचान ।
सादगी जीवन, इसे रास ना आए
यह अपने को इंसान कहलाए ।।
मानवता भूल गया जो इंसान
स्वार्थ में जीता ,फिर भी परेशान।
खुशियां किसी की, देख ना पाए
यह अपने को इंसान कहलाए ।।
रूप धर इंसान का,भटके तेरी आत्मा
भज ले-भज ले, जीवन में परमात्मा ।
जप ले-जप ले ,राम-नाम,राम-नाम
कर ले-कर ले , तू सत्काम-सत्काम ।।
पल -पल भटके क्यों??? इंसान
सत्कर्म कर बना अपनी पहचान।
मरकर भी रहे ,तेरा मान सम्मान
बन जा तू सच्चा इंसान,सच्चा इंसान ।।
✍️मनीषा भुआर्य ठाकुर

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