प्रिय बचपन,
ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह रह कर तड़पाती है।
क्यूंँ तुम मुझसे रूठ गई, क्यों याद न मेरी आती है।

तेरी कोमल गोदी में मैं अल्हड़, चंचल, मदमस्त रही,
जीवन के दुष्कर् राहों से, अनजान रही बेफिक्र रही।
ये उम्र यूँ ही हर दिन अपना जब आगे कदम बढ़ाती है,
कानों में तेरी मधुर याद , इक मीठी तान सुनाती है।ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह रहकर तड़पाती है।

जिसकी कीमत उस वक्त मुझे मस्ती में कुछ ना जान पड़ी,
अब आगे बहुत निकल आई ,पीछे छूटी अनमोल घड़ी।
फिर आन मिलो और गले लगो इसलिए लिखी यह पाती है।
ए बचपन तेरी याद मुझे अब रह रहकर
तड़पाती है।


                   मीनू त्रिपाठी


                             
        एक पाती बचपन के नाम भाग २



प्रिय बचपन,
ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह- रहकर तड़पाती है।
क्यूँ तुम मुझसे रूठ गई , क्यों याद ना मेरी आती है।

तेरी कोमल गोदी में मैं, अल्हड़, चंचल मदमस्त रही,
जीवन के दुष्कर राहों से, अनजान रही, बेफिक्र रही।
यह उम्र यूंँ ही हर दिन अपना, जब आगे कदम बढ़ाती है,
कानों में तेरी मधुर याद, इक मीठी तान सुनाती है।
ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह- रहकर तड़पाती है।

जिसकी कीमत उस वक्त मुझे, मस्ती में कुछ ना जान पड़ी
मैंआगे बहुत निकल आई, पीछे छूटी अनमोल घड़ी।
अबआन मिलो और गले लगो, इसलिए लिखी ये पाती है।
ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह- रहकर तड़पाती।

पेड़ों पर चढ़कर कूदूँ मैं, 
डाली से लिपटा झूलूँ मैं।
इंजन की सीटी पर दौडूँ,
नित नई पतंगे लूटूँ  मैं।।

बहना को गोदी ले पटकूँ
उसकी चोटी को खींचूँ मैं।
पापा के कांँधे सैर  करूँ,
माँ के आंचल को भींचूँ मैं।।

गुदगुदी पेट में करने को,
तू पास ना मेरे आती है।
आंँखों को जब भी बंद करूंँ,
तू दूर खड़ी मुस्काती है।

ऐ बचपन तेरी याद मुझे, अब रह- रहकर तड़पाती है।।
                                     
                                मीनू ' सुधा'