युद्ध अंतिम चरण में था। लंकेश के अधिकांश सेनानी, सारे पुत्र, खर दूषण का पुत्र मकराक्ष, महाबली कुम्भकर्ण सभी युद्ध में खेत रहे। अपनी सारी संचित शक्तियों और महादेव से आशीर्वाद लेकर रावण युद्ध के लिये तैयार हुआ।

"हे तीनों लोकों के देव। रावण कभी भी खुद को ईश्वर नहीं मानता। आपका हमेशा शरणागत रहा है। आपकी खुशी के लिये अपने दसों मस्तक दान दे चुका हूं। फिर भी अपने इस अनन्य भक्त के प्रति आपकी उपेक्षा..। प्रभु यह समझ के परे है। आज रावण केवल भक्ति में शीश झुकाने ही नहीं बल्कि अपना अधिकार मांगने आपके समक्ष खङा है। "

तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। भगवान शिव तो वैसे भी औढरदानी हैं। उसमें रावण जैसे भक्त की पुकार पर न पहुंचे, ऐसा हो ही नहीं सकता। आज रावण कुछ भी मांगेगा, उसे मिलेगा। और देवताओं की शंका सत्य साबित हुई। भोलेनाथ प्रगट हुए।

" वत्स रावण। बताओं क्या अधिकार चाहिये तुम्हें। यद्यपि देवों की इच्छा श्री राम की विजय है। फिर भी तुम्हें जीत का वर भी दे सकता हूँ। भक्त के अधिकार की रक्षा होनी चाहिये।"

"नहीं देव। जीत तो रावण की दासी है। कैलाश उठाने बाली भुजाओं में अभी इतना बल है। कुछ समय से उद्दंड बनी जीत को वश में करना रावण को अच्छे से आता है। फिर भी प्रभु। मुझे आपसे शिकायत है। आप अपने भक्त के शत्रु की मदद कर रहे हैं। क्या यह सत्य है। "

" वत्स। ईष्र्या की अग्नि सोचने समझने की शक्ति नष्ट कर देती है। तुम्हारी तरह राम भी मेरा भक्त है। "

" तो क्या उन्होंने अपना शीश आपको निवेदित किया है। उसी क्षण का अधिकार चाहता हूं। "

" वत्स रावण। फिर सोच लो। मोल चुकाने के बाद फिर व्यक्ति स्वतंत्र हो जाता है। अभी तुम मेरे श्रेष्ठतम भक्त हों। ऐसा भक्त जिसने अपनी भक्ति के लिये अपने दसों सिर अर्पण किये। "

"भगवन। आज की अवस्था में मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा है। आप मुझे मेरे एक सिर के बदले लाख सिर दे दें। इतनी बार मेरे मस्तक कटने पर ही मेरी मृत्यु हो। "

" ओर यदि राम ने तुम्हारे मस्तक इतनी बार काट दिये तो फिर क्या होगा। "

" भगवन। आप सचमुच भोलेनाथ हैं। भला ऐसा कोन सा मनुष्य और तो और देव है जो बिना थके इतनी बार मेरे मस्तक काट सके। "

" ठीक है रावण। तुम्हारी भक्ति का मैं मोल चुकाता हूं। राम तुम्हे तब तक नहीं मार सकते जब तक तुम्हारे हर मस्तक को एक लाख बार न काट दें। अब मेरे रुकने का कोई कारण नहीं है। भक्त और भगवान का संबंध मोल चुकाने के बाद अब नहीं रहेगा। "

भोलेनाथ अंतर्धान हो गये। अपनी जीत के प्रति आश्वस्त रावण ने जब चढाई की तो श्री राम की सेना में भगदङ मच गयी। खुद श्री राम रावण से पार नहीं पा रहे। अच्छे से अच्छे दिव्यास्त्र रावण पर असफल हो रहे। जितनी बार मस्तक कटता, एक नया शीश रावण को मिल जाता।

" श्री राम। जब तक हर मस्तक एक लाख बार न कट सके, रावण अजेय है। बिना थके इतना उद्यम करना किसी भी देव या दानव के लिये संभव नहीं।"

आकाशवाणी सुन श्री राम चिंतित हो गये। सचमुच बिना थके कौन इतनी देर तक मस्तक काट सकता है। उसमें रावण के अस्त्रों का भी उत्तर देना। और समय निकालकर मस्तक काटना। कुछ दस लाख बार मस्तक कैसे काटे जा सकते हैं। कहाॅ मिलेगी बिना थके उद्यम करने की शक्ति।

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आज का युद्ध जीत रावण विजय के मद में चूर था। श्री राम के शिविर में खामोशी थी। श्री राम बिना थके लगातार उद्यमी को सोच रहे थे। कोई भी देव उन्हें ऐसा न दिखा। अचानक उनकी आंखों में चमक आ गयी।

"लक्ष्मण। संसार में केवल स्त्रियां बिना थके उद्यम करती हैं। एक माता एक दिन नहीं अपितु कई दिन और रात बिना थके बच्चे के लिये जग सकती हैं। स्त्रियों में इस शक्ति का कारण खुद माता आदि शक्ति हैं। केवल माता ही मुझे रावण से जीतने की शक्ति दे सकती हैं। कल प्रातः एक लक्ष कमल पुष्पों से माता की आराधना कर युद्ध में जाऊंगा।तुम, हनुमान और अंगद को लेकर रावण को रोकना। आदि शक्ति माता का आशीर्वाद लेकर मैं रावण का सामना करूंगा। "
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अट्टहास करते रावण का सामना हनुमान और अंगद कर रहे थे। फिर लक्ष्मण भी आ पहुंचे। पर राम युद्ध से दूर मिट्टी से बनी माता के विग़ह के समक्ष भक्ति पूर्वक प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना करते और एक कमल पुष्प अर्पित करते। फिर प्रार्थना करते और दूसरा पुष्प अर्पित करते। एक लक्ष पुष्प अर्पित करने थे। और हर पुष्प की गिनती याद रखते। पर यह क्या। गिनती से तो दो पुष्प कम पङ रहे हैं। और पुष्प समाप्त हो गये। हनुमान ने गिनकर पुष्प रखे थे। लक्ष्मण ने भी गिनती की थी। पर अब दो पुष्प कम पङ रहे हैं। युद्ध में सभी रावण को रोक रहे हैं। ऐसे में दो कमल पुष्प कहाॅ से लाऊं। राम तुम कुछ भूल रहे हो। दो कमल पुष्प अभी हैं। तुम्हारे पास ही हैं। याद करो माता तुम्हें क्या कहकर बुलाती थीं। मेरा राम तो राजीव लोचन है। पिता भी कहते थे कि राम की आंखें एकदम कमल पुष्प हैं। दुनिया को शक्ति देने बाली, दुनिया को जन्म देने बाली संसार की समस्त स्त्रियों को शक्ति संपन्न बनाने बाली माता दुर्गा। राम तुम्हें प्रणाम करता है। आपकी पूजा में अपने दोनों नैत्र आपको अर्पित करता है। "

अचानक वायु का बहना रुक गया। सभी देवताओं के मुख से चीख निकलीं। श्री राम तलवार से अपनी दोनों आंखें निकालकर देवी माता की प्रतिमा को अर्पित कर चुके थे। इतना प्रकाश हुआ कि देख पाना किसी सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं। सिंह पर सवार माता दुर्गा प्रगट हुईं। श्री राम की नजरें पहले जैसे ही स्वस्थ हो चुकीं थीं। माता का दर्शन कर श्री राम उनके चरणों में नत मस्तक थे। 

"श्री राम। तुम स्त्रियों का सम्मान करते हो। अपनी पतिब़ता स्त्री के सम्मान के लिये शक्तिशाली रावण से युद्ध कर रहे हो।भविष्य में संसार यही कहता कि रावण ने एक मस्तक के लाखों मस्तक अपना सिर अर्पित करके पाये थे पर श्री राम ने ऐसा क्या अर्पण किया कि अपराजेय शक्ति प्राप्त हुई। अब तुमने सिद्ध कर दिया कि ऐसी शक्ति के तुम्हीं अधिकारी हो। अब धनुष पर तीर चलाते हुए तुम्हारी भुजाएं कभी नहीं थकेंगीं। जितने समय में एक तीर चलाते थे, उतनी समय में अनेकों तीर चलाने में सक्षम होंगे। एक साथ अनेकों तीर धनुष से चला सकोंगें। अस्त्र शस्त्र में तुमसे श्रेष्ठ कोई और है भी नहीं। आज सायं रावण का वध करके ही अपने शिविर में वापस आओंगे। "

माता के अंतर्धान होते ही श्री राम अपने अस्त्र उठाकर रण के लिये चल दिये।





      दिवा शंकर सारस्वत "प्रशांत"