ए ख़ुदा तेरी दुनिया भी क्या चीज है,

हर कदम हर तरफ कुछ तो परदे में है।

इक कलाकार और कितने किरदार हैं,

तमाशा ए हक़ीक़त भी परदे में है।

लोग कितने झुके दिखते सजदे में हैं,

जाल बिछते मगर कितने परदे में हैं।

फकत दिन की चकाचौंध क्या खूब है,

काली राते मगर कितनी परदे में हैं।

ऊंचे महलों के परदे भी क्या खूब हैं,

चैन गुम है सुकूं कितने परदे में है।

हंसते होंठों की फितरत भी क्या खूब है,

कितने सच्चे हैं झूठे हैं परदे में है।

कुछ पानी यहां कुछ आंसू भी हैं,

कितनी चीखें मगर रहतीं परदे में हैं।

ये शराफत का बाना भी कुछ कम न है,

असली सीरत ढकी रहती परदे में है।

रिश्ते नातों की चलती सी इक भीड़ है,

आदमी है अकेला ये परदे में है।

चलती सांसों की रफ्तार भी क्या कहें,

आदमी कितना जिंदा ये परदे में है।.........


✍️🙏🌄 ऋतु बाजपेई