मृग तू जा भटका किस वन में, तेरी कस्तूरी यहां नहीं।
इस चिर निर्जन से कानन में, जहां कोई कलरव शेष नहीं।
विस्तृत भूधर मालाएं हैं, नभ चुंभित जिनकी मूर्धाएं,
चहुं ओर तमश के साए हैं, घटती ऊषा की आशाएं,
क्या रवि पथ में गिरि बाधा है, यहां कोई रश्मि शेष नहीं।
मृग तू जा भटका किस वन में,तेरी कस्तूरी यहां नहीं।
इस चिर निर्जन से कानन में, जहां कोई कलरव शेष नहीं।
हिम शैल बन चुके निर्झर हैं, नित आती शीत बयारें हैं,
लगती जिजीविषा दुष्कर है, नित रुकती रक्त धाराएं हैं,
किस बियावान तू आ पहुंचा, मधुमास यहां अब शेष नहीं।
मृग तू जा भटका किस वन में, तेरी कस्तूरी यहां नहीं।
इस चिर निर्जन से कानन में, जहां कोई कलरव शेष नहीं।
इक चिर एकान्त अनुभूति है, इस क्षण न कोई सहेली है,
कुछ सन्ध्या काल प्रतीति है, अलसायी हर एक बेली है,
अंकित खारी जल बूंदें हैं, मृदु मुस्कानें अब शेष नहीं।
मृग तू जा भटका किस वन में, तेरी कस्तूरी यहां नहीं।
इस चिर निर्जन से कानन में जहां कोई कलरव शेष नहीं।
भ्रम है तेरा पथ ओझल है, तू मुक्ति समर से भय न कर,
सब यत्न तेरे कुछ निष्फल हैं, तू दिव्य शक्ति का पूजन कर,
उस दिव्य कांति की आभा में, तिनका भी तम का शेष नहीं।
मृग तू जा भटका किस वन में, तेरी कस्तूरी यहां नहीं।
इस चिर निर्जन से कानन में जहां कोई कलरव शेष नहीं।
..........✍️🌅🙏 ऋतु बाजपेई

2 टिप्पणियाँ
आपकी रचना बहुत अच्छी है बधाई हो🙏🏻