मूल नायक है वह वीर, जिसने पकड़ा प्रताप का भाला।
शहिद हुए निर्भय होकर, जो थे मातृभूमि के रखवाला।
गूंज उठी थी दसों दिशा, जब भड़की थी भीषण ज्वाला।
विखंड हुआ था अंग-अंग, जो था वीर हिम्मत वाला।
इंच-इंच से तन को मापे थे, चौड़ी थी केसरी की छाती।
कैसे माने उस माँ का मन, जिसके घर का था वो थाती।
शव बिखरे थे खण्ड-खण्ड में, समझ न पाए चाल को।
कैसे स्वीकार करी थी वो माँ, सौंपी थी जो पूर्ण लाल को।
कल्पना किया पुलवामा की, धारा बनी थी शवशाला।
गति से ना लेखनी चलती, सोच के वह स्मृतिशाला।
घनश्याम–खण्ड की गर्जन, हृदय में छाई नीरदमाला।
सिसक-सिसक के रोता मन, दृग से बहती जयमाला।
लिखने को यह शौर्य व्यथा, रोक ना पाया मन है विवश।
कैसे मनाऊं प्रेम दिवस को, स्मृति है वह काला दिवस।
उदित करुण है उर अंतर में, नहीं है भाव में रति रस।
कैसे लिख दूं प्रणय के गीत, हीय अंतर्मन है नत नीरस।


                    सतेश देव पाण्डेय