कांटे जैसे  सूखा तन,व्यथित  सा मन,
अस्थियों के  एक ढांचे से दिखते हैं।
 ये गरीब  दीन ,हीन कृषकाय बालक, 
खाने के एक   दाने  के लिए तरसते हैं। 
विवश आंखो से सड़क  पर आने जाने,
वालों को आशाभरी निगाहों से देखते है।

बैठे   हुए है ये  सब सड़क के  किनारे,
उम्मीद की एक छोटी किरण के सहारे।
 कि कोई दाता दानी बाबू आ जाएगा,
कोई तो उनकी दशा पर रहम खाएगा।
और वह  कुछ खाने पीने का सामान,
या कुछ पैसे उन्हें पकड़ा कर जाएगा।

तभी सरसराती हुई एक कार  सड़क  पर आई।
जिसमें खद्दरधारी नेता संग ,उनकी पी.ए  आई।
नेताजी सूखा राहत क्षेत्र के दौरे पर थे आए थे।
क्षेत्र के लोगों के भले हेतु कई योजनाएं लाए थे।
अचानक उनकी नजर उन बालकों पर पड़ गई।
उनके  शातिर दिमाग में एक  योजना उपज गई।

उन्होंने खींसे निपोरते हुए अपनीे पी.ए से कहा --
" "अरे देखो तो..... .कितना  नेचुरल सीन है। " "
" "तुम्हारा  ये आधुनिक  कैमरा  भी रंगीन है ।" "
" " चाहिए लगनी फोटो एकदम विचारणीय है।" "
बालकों  की भावनाओं से भरी फोटो खींच लो।
पेट  पर और आंखों पर ज्यादा  फोकस करो।

अगली मंत्रिमंडल की बैठक में इसको पेश करूंगा।
सूखे और अकाल की समस्या,पर एक सर्वे करुंगा।
इस मसौदे को वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन को दिखाऊंगा।
वहां से भूखी और  अकाल पीड़ित जनता के लिए,
बहुत  तगड़ा आर्थिक  अनुदान सैंक्शन करवाउंगा।
यूं हीं गरीबों और दीनों का मसीहा थोड़े बन जाऊंगा।

और अपना नाम समाचार पत्रों  मेंं भी छपवाना है।
सोशल मीडिया में भी तो खबर वायरल करवाना है।
उन्होंने अपने कुर्ते  के  पाकेट से ड्राईफ्रूट निकाला।
योजना  पर  बातें करते  करते, सारा  चबा  डाला।
बालक उन्हें सुनते रहे,कुछ समझ मेंं भी न आते  हुए।
उन्हें ललचाई नजरों से , देखते रहे ड्राईफ्रूट खाते हुए।


स्नेहलता पाण्डेय
       नई दिल्ली