जिस कण से बना ये जींवन
यादों की 'रेत' बनीं
जितनी मीठी हों बातें
बिषधर का धूल पड़ी
जिस कण से.....
ना बुरा किसी का सोच
ना साथ में कोई खोंट
फिर क्यों ढ़ल गया
प्यार की रेत
जिस कण से.....
डोभा था फूल की दानें
उग आये साथ में काँटे
मुस्कानें की थी आदत
काँटें भी पिछे पड़ी
जिस कण से.....
ना काम करो कोई ऐसा
जिससे हों तकलिफें खड़ी
रहना सुख-दु:ख के साथ में
जैसे कोई रेल बड़ी
जिस कण से.....
लेखक:-विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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