महफिल सज उठी 
तरन्नुम साज भी बज उठा 
फिर भी तन्हाई बेतहाशा बढ़ गई 
जब लोगों की वाहवाही शुरू हुई 
अब कर रहे कहकशे दुनिया अधबौराई होकर 
कैसे तलाशे अब सुकून ए जिंदगी 
जो रह गई है बदहवास बनकर

समझ नहीं तन्हा जिंदगी के अनसुलझे सवालों का 
दांवपेंच का हुनर भी सिखाया करो अक्सर जो तुमसे पूछूं कुछ  इन सुरमई अंखियों में तुम मुझे ही रहने देना 
आंखों में जो समुंदर रहता है ना उसे बेवजह ना बहने देना बेआबरू नहीं होने दूंगा, जिंदगी भरका प्यार मांगता हूं तुझसे    रख मुझसे भी रश्क एक चाह मांगता हूं मैं तुझसे

न फिक्र कर इस जहां में तेरा भी कोई है 
हां मेरा साथ तेरा साथ पाकर कुछ बदनाम सा हो गया है 
जज्बातें दिल की सारी मैं तुमसे बयां करता चला गया 
तुम डूबती चली गई और मैं मदहोश सा होता चला गया 
ये दुनिया तो ढूंढेगी तुझमे मुझमें खामियां ही खामियां 
तेरे मेरे इश्क़ में आखिर होंगी हमारी ही प्यारी सी बदनामीयां



           राजेश्वरी ठाकुर
                छत्तीसगढ़