जिन की हिम्मत नहीं थी
दहलीज लांघने की
कैसे वह आसमां पर परचम लहरा रही है ?
जो कैद थी रसोई में
कैसे विकट क्षेत्र में भी नाम कमा रही हैं ?
जो मुख - बधिर हो, हमारा जुल्म सहती थी
कैसे आवाज उठा रही है ?
जिनको दिए हमने सिर्फ कर्तव्य
कैसे अधिकार के लिए लड़ रही हैैं ?
हमने तो कोशिश की थी
ये रहे अशिक्षित, धर्मांध
ताकि रहे हमारा ही वर्चस्व
पर वह संविधान में लिख गया,
"नारी है समानता की अधिकारी"
नहीं, यह नहीं हो सकता
करो इन पर हमला
बलात्कार, एसिड फेंक कर
रास्ता रोक दो इनका
फिर इन्हीं पर इल्जाम लगा दो
स्वच्छंद, पथभ्रष्ट होने का
और मासूम बनकर पूछो
ये कहां आ गए हम ?
धनु दयाल

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