वेवजह जागना एक नशा ही तो है
कोई होकर भी ना हो सका एक सजा ही तो है
कोई नहीं समझता हाल ए दिल हमारा
कलम से लिखे एक कला ही तो है
गैरों से क्या रखें उम्मीद अपनी
खुद लुट गये यह काफी ही तो है
नींद मेरी ले गए चैन सब खो गया है
क्या कहूं या ना कहूं क्या से क्या ये हो गया है
✍️लक्ष्मीनारायण

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