कितने अज़ीब रिश्ते है यहाँ पर,कल तक लगते थे जो अपने
आज हो गए है क्यों बेगाने।।
पूछता है मन ये सवाल उनसे क्या वो भी भूल सकेंगे ये हमारे प्यार भरे अफ़साने।।
कभी न कभी समझेंगे वो हमको भी अपना क्योंकि हमराज़ थे हम उनके जो आज लग रहे है उनको बेगाने।।।
जब पूछता है दिल हमसे उनका ख़्याल आने पर अश्क़ क्यूँ बह निकले रोक लो इन्हें न समझेंगे वो भी क्योंकि नासमझ जो ठहरे।।
रूठे अब ज़माना हमसे क्या फ़र्क पड़ेगा हमें ,हमने तो शिद्द्त से मोहब्बत की थी उनसे वो नासमझ अब क्या जाने।।
एकता श्रीवास्तव

0 टिप्पणियाँ