कहाँ गई कहाँ गई तुम
आज गोरैया.....
घर में सब तुमको ढूंढ रहे हैं
पापा और भैया....

आज तुम क्यों गुस्साई हो किस
बात से घबराई हो....
घर की खुशियाँ बढ़ जाती है जब
तुम आ जाती हो....
जोड़ते हैं सब तुम्हें ही पकड़ने जब जब तुम आ जाती हो....
देखो कितना ही तुम सबके मन को
भाती हो...
जब जब तुमको सब पकड़े,धीरे धीरे
तुम चलके फुर्र हो जाती हो....
तुमको पकड़ने को यह आंखें
ललचातीं हैं.....
हमारा घर है तेरे लिए इक भूल भुलैया,
कहाँ गई तुम ओ गोरैया....
मेहनत करती हो कितना तुम अपना नीड़
बनाने को....
उड़ती हो तुम कितना ही एक एक तिनका
लाने को....
अपने बच्चों की तुम रक्षा करना समझती
हो जिम्मेदारी....
मुंह में डालती हो उनके इक इक दाना भोजन
का,तुम तो हो बड़ी सयानी....
है गोरैया रानी....
गोरैया बोली भईया, आज तुमने क्यों मुझ
सवाल उठाये....
मेरे बैठने वाले बगीचे क्यों तुमने साफ
करवाये....
अपने बच्चो के लिए थी मै वहाँ नीड़
बनाती....
इक इक तिनका मै लेकर मै थी उसे
सजाती....
तोड़ दिये तुमने वो नीड़ जो मै मेहनत
से थी बनाती....
अब न ढूढ़ मुझे तुम भैया, दूर निकल
आएं बहुत रे भैया...
करते रहो तुम अब ढूढनें को मुझे
ता ता थैया.....!
🧡 मनु✍🏻


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