आँखो में सहनशीलता धरा सी ।
कभी पहाड़ो सी कठोर भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
ख्वाब आसमान से ।
बुँदो की तरह बिखरती भी हूँ
हाँ मैं स्त्री हूँ।
चहेरे की आभा सुरज सी।
अग्नि सी अन्दर जलती भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
इरादे मेरे दृढ़ पेड़ से।
दिल से फूलों जैसी नाजुक भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
ममता मेरी चाँदनी जैसी।
शीतलता से पिघलती भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
प्यार मेरा तारों की छाँव सा।
टुटकर संवरती भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
आशा की ज्योति का दीपक बनकर ।
पल पल रोशनी करती हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
ईश्वर की प्रकृति ने मुझको रचा।
इस सृष्टि की रचयिता भी हूँ।
हाँ मैं स्त्री हूँ।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
दिल्ली

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