आज फिर मां की आंखें सूजी हुई देखकर संतोष जान गई कि बापू ने मां पर हाथ उठाया है । ऐसा अक्सर होता रहता था । बापू का हाथ मां की हर बात पर चल जाता था । ऐसा नहीं था कि मां, बापू के आगे जवाब देती थी या किसी भी तरह की कोई कमी रखती थी ‌। वह तो बापू के काम बिना कहे ही दौड़ - दौड़ कर करती थी । फिर भी बापू, मां को मारने के लिए कोई ना कोई वजह ढूंढ ही लेता । साथ ही जोर-जोर से ऐसे बोलता जैसे तो कोई बापू को ही मारा जा रहा हो । यह सब मां चुपचाप सहन करती ।

"मां, आज फिर बापू ने आप पर हाथ उठाया है ना ?" संतोष अपना स्कूल बैग एक तरफ रखते हुए अपनी मां देविका से बोली ।
देविका ने संतोष की तरफ देखे बिना ही कहा, "जा, हाथ - मुंह धो ले, मैं तेरे लिए खाना परोसती हूं ।"
"मां, आप कौन सी मिट्टी की बनी हो ? जो बापू के जुल्म चुपचाप सहन करती हो । विरोध क्यों नहीं करती ?" संतोष गुस्से में मां से बोली ।
"बेटी, तुम्हारे बापू थोड़ा परेशान रहते हैं । वो सब का गुस्सा मुझ पर निकाल देते हैं और कोई बात नहीं है ।" देविका ने संतोष से आंखें चुराते हुए कहा ‌।
"वाह मां वाह, बापू से मार खाकर भी उन्हें दोष देने के बजाय उनकी तरफदारी कर रही हो । अरे, अगर परेशान हैं तो क्या आपको मारेंगे ? मां, क्या आप परेशान नहीं होती ? तो आप क्यों नहीं मुझे या बापू को मार कर अपना गुस्सा निकालती ? बापू दुखी हो तो शराब पीएगा, परेशान हो तो आप को मारेगा, दोस्तों के बीच जाएगा तो बीड़ी-सिगरेट पीएगा, थका होगा तो आपसे सेवा करवाएगा । ऐसा क्यों मां ? ऐसा क्यों ? क्या आप इंसान नहीं है ? आपको दर्द या दुख नहीं होता ?" संतोष क्रोध के कारण कांप रही थी । उसकी आंखों से अंगारे बरस रहे थे ।
मां, संतोष के सिर पर हाथ रख कर बोली, "बेटी, शांत हो जा । दोष तो मेरा ही है जो मैं उनकी आवाज नहीं सुन पाई, वो मुझे बुला रहे थे ।"
"मां, अपने-आप को दोष देना बंद करो ।" संतोष बिफरी ।

संतोष ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ती है  । पढ़ाई में होशियार संतोष को बस पढ़ने में ही संतोष मिलता था । वह अपने पिता रोशन के व्यवहार को बचपन से महसूस करती आई थी, जो अब गुस्से में तब्दील होता जा रहा था । वह अपने बापू से ज्यादा मां को दोषी समझती थी जो यह सब अत्याचार सहन कर रही थी । 
देविका की दबी आवाज सिर्फ संतोष की पढ़ाई छुड़वाने पर ही निकली थी कि संतोष अपने स्कूल की पढ़ाई जरूर पूरा करेगी जिसे रोशन ने ना चाहते हुए भी स्वीकार कर लिया था ‌।

एक दिन संतोष कुछ सामान लेने बाजार गई । लौटते हुए वह अपनी मस्ती में चली आ रही थी । तभी दो हाथों ने उसके मुंह को कपड़े से दबा दिया । संतोष होश खोती चली गई । जब उसे होश आया, वह अस्त-व्यस्त हालत में सड़क के किनारे पड़ी थी और उसके चारों तरफ भीड़ लगी थी । घर पर देविका बहुत परेशान थी । रोशन तो देविका को खरी-खोटी सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था । जैसे-तैसे संतोष को कुछ लोगों ने घर पहुंचाया । देविका की आंखों के आगे अंधेरा छा गया । रोशन का तो जैसे माथा ही खराब हो गया । वह जोर-जोर से रोने लगा । पड़ोसियों ने जैसे-तैसे सब को शांत किया और आगे क्या किया जाए इस पर विचार होने लगा । 
संतोष को सदमा लगा था । वह ना कुछ बोलती ना खाती । बस खाली आंखों से छत घूरती रहती । देविका ने जैसे-तैसे अपने को संभाला और संतोष को हिम्मत दी । 
रोशन ने पुलिस को खबर करने से साफ इंकार कर दिया । उसके अनुसार, "जो होना था, वह हो गया । पुलिस चौकी के चक्कर लगाने से बदनामी और बढ़ेगी ।" 
रोशन और ज्यादा हिंसक और चिड़चिड़ा हो गया । वह इस सब का दोषी संतोष और देविका को मानता ।

इसी तरह कई दिन निकल गए । 
देविका ने संतोष से कहा, "बेटी, तुम्हें अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए । पढ़ाई में दिल लगाओ । समय सब घाव भर देता है । बाहर निकल कर सब का सामना करो । अपने को मजबूत बनाओ । धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा ।"

मां के समझाने पर संतोष की सोचने-समझने की शक्ति लौटने लगी ।
रोशन एक दिन देविका पर चिल्ला रहा था, "इसने हमारी नाक कटा दी है । यह कहीं पढ़ने नहीं जाएगी । घर में ही पड़ी रहे तो अच्छा है । तुम्हें क्या पता, बाहर मुझ पर क्या- क्या गुजरती है ? लोग किन निगाहों से देखते हैं ? मुझ पर उंगली उठा कर बातें करते हैं और यह सब तुम्हारी वजह से हुआ है । सब तुम्हारा दोष है ।"
संतोष कमरे से बाहर निकल आई और मां की तरफ देखा ।
देविका शांत भाव से रोशन को देखते हुए दृढ़ता से बोली,
"संतोष अपनी पढ़ाई जरूर पूरी करेगी । अगर यहां नहीं तो कहीं और, मैं इसे पढ़ाई नहीं छोड़ने दूंगी ।"

रोशन गुस्से में देविका के पास आया और बोला, "अभी तुम्हारा पेट नहीं भरा, यह सब करके ।" और देविका पर हाथ उठाने लगा ।

देविका ने अपनी पूरी शक्ति से रोशन को धक्का लगाया और दांत पीसते हुए बोली, "संतोष अपनी पढ़ाई किसी भी हालत में नहीं छोड़ेगी । तुमने उस पर हुई ज्यादती की रिपोर्ट नहीं लिखवाई । दोषी को ढूंढने की कोशिश नहीं 
की । वह खुलेआम घूम रहा है । उसका हौसला और 
बढ़ेगा । उसने गलत किया पर ठीक तुम भी नहीं कर रहे 
हो । तुमने मेरे साथ जो किया, वह मैंने सहन किया लेकिन अब नहीं । औरत के शरीर को तुम पुरुष खिलौना समझते हो ‌। वह तो गैर था । तुम तो अपने हो । तुम्हें शादी करने से मुझ पर जुल्म करने का प्रमाण पत्र  मिल गया । तुम भी तो रोज मेरे साथ ज्यादती ही करते हो । कभी सोचा है मेरे मन और तन पर क्या गुजरती है । हम दोषी नहीं हैं, सुना तुमने ? हम दोषी नहीं हैं । दोषी वह है । उसे सजा मिलनी चाहिए । दोषी तुम भी हो । तुमने मेरी पढ़ाई, मेरा हुनर सब ताक पर रख दिया ‌। यहां तक कि मुझे इंसान तक नहीं समझा । लेकिन अब और नहीं । सुना तुमने ?
देविका गरजी, अब और नहीं । हम दोनों का साथ देना हो तो दो, नहीं तो हमें तुम्हारी जरूरत नहीं । हम दोनों यहां से चले जाएंगे ।"

                                             क्रमशः

                   धनु दयाल