मैं अंतिम स्वांस गिन रही थी
और वह 
मेरे इधर उधर बैठे
कुछ फुसफुसा रहे थे आपस में
शायद जानना चाहते थे
मेरी जमा पूंजी
जो जीवन भर में छिपाकर रखी हैं मैंने

परन्तु यह क्या
मेरे हाथ भी तो खाली थे
फिर किसी को देती तो क्या
कुछ किलकारियां
गिर गिर कर उठना
पल में रुठना और मानना
गुड़िया की सगाई
वह चन्दा मामा की बातें
टेसू की बारातें
वृक्षों पर चढ़ना
बाबा के डर से मां के आंचल में छिपना
वह कागज की नावें
मस्ती भरी बरसातें
सावन के झूले
और न जाने क्या क्या
न जाने कब सौंप दिए थे जीवन को

दुनिया की अदायें समझती
उससे पहले ही
किसी को सौंप दिया गया जीवन
अब चौका चूल्हा
नमक मिर्च मसालों के झगड़े में
जवानी ‌की
चंचलता 
अल्हड़ता भूल
याद रह गयीं कुछ
जिम्मेदारियों के मेले की अदाकारियां
पायल की छम-छम
चूड़ियों की खन खन
ननदी संग फागुन
सावन के झूले
पिया घर भूले
पिया का प्यार
बच्चों पर दुलार
न्यौछावर कर दिए पहले ही
जवानी की चौखट पर
जीवन के

कुछ खट्टे 
कुछ मीठे अनुभव
कुछ मुस्कुराते पुष्प
कुछ आंसुओं की माला
कुछ द्वेश के अंगारे
कुछ प्रेम भरे धारे
झुर्रियों भरी देह के नाम कर दिये

अब बची है तो बस रुह 
वह अनन्त की धरोहर है
देह पंचभूतों की
मेरा है भी क्या
जो किसी को दे पाती
एक दर्द है वह मेरा है मेरा ही रहेगा
उसे दे दूं
नहीं नहीं
कभी नहीं
वही तो औरत का असली खजाना है।।

                     देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद