पाठक गण कृपया इसे एक बच्चे की नजर से ही पढें ।

दिल्ली
बात अक्टूबर 1984 की है, जब यह खबर फैली कि दो सरदारों ने इंदिरा गांधी को मार दिया । पूरी गली में लोग झुंड बनाकर बातें करने लगे । हम बच्चे भी बदलते माहौल को देख रहे थे, अचानक सभी लोगों में दहशत दिखाई देने लगी थी । सभी रातों को जागने, चौकीदारी करने, अपने घरों की छतों पर ईंट पत्थर जमा करने तथा डंडों का बंदोबस्त करने लगे थे । सभी बच्चे मौके की नजाकत को समझने की कोशिश करते हुए, थोड़े सहमे हुए थे । बाहर बाजार में लूटपाट शुरू हो गई थी । हम बच्चे गली के बाहर खड़े देखते कि बहुत से लोग सामान लूट कर ले जा रहे हैं ।
खुद हमारी गली में ही कई लोग बहुत सामान लूट कर लाए थे । मैं गली के बाहर जब यह सब देख रही थी तो एक व्यक्ति के सामान से डायरी गिर गई । मैं वह उठाकर घर ले आई और अपने पिता को दिखाया कि देखो, मुझे एक डायरी मिली है । उस समय मैं बारह साल की थी ।
पिताजी ने कहा, "अरे, यह तो तुमने गलत किया । किसी के दुख का फायदा नहीं उठाते, हमें किसी को नहीं लूटना ।
जाओ यह डायरी वापस दे कर आओ ।"
मैंने कहा, "सारी दुनिया कितना सामान लूट कर अपने घर ले जा रही है । मैंने एक छोटी सी डायरी ले ली तो क्या हुआ ?"
वे बोले, "बात छोटी या बड़ी चीज कि नहीं, लूट की है । हमें गलत तरीके से कोई सामान नहीं लेना चाहिए ।"
मैंने कहा, "वह तो अब चला भी गया जिसके सामान से यह डायरी गिरी थी ।"
वे बोले, "कोई बात नहीं, तुम इस डायरी को उसी जगह छोड़ दो, जहां से तुम ने उठाई थी ।"
मैंने वह डायरी वही डाल दी और सोचा मेरे एक डायरी लेने से थोड़ी ना कुछ हो जाएगा ।
पर आज सोचती हूं कि मेरे पिताजी ने मुझे बहुत सच्ची और सही सीख दी थी जो आज भी कायम है ।
मैं अपने पिता को नमन करती हूं ।
                                         ‌‌ क्रमशः