पाठक गण कृपया इसे एक बच्चे की नजर से ही पढ़ें ।
दिल्ली
छेती की कोयले की टाल गली के बाहरी हिस्से में थी ।
जिसका एक दरवाजा गली में खुलता था । दूसरा दरवाजा बाहर बाजार की तरफ खुलता था, जहां से वह अपनी पाली हुई भैंस का दूध बेचता था । वह सरदार था पर उसके पगड़ी नहीं थी । तब हमें सरदार शब्द की भी जानकारी नहीं थी ।
उसका असली नाम क्या था, यह तो किसी को भी नहीं पता लेकिन सब उसे छेती कहते थे । बच्चे उसे छेती छेती कहकर चिढ़ा कर भागते थे, पर वह कभी किसी को डांटता या मारता नहीं था, न ही बच्चों के घर जाकर उनकी शिकायत करता था । जाने क्यों मुझे उससे डर लगता था । वह देखने में हैरी पॉटर के हेग्रिड जैसे था लेकिन सिर पर हैग्रिड जितने घने बाल नहीं थे । वह हमेशा एक लंबा कच्छा और बनियान पहने दिखता था । वह गली की तरफ खुलने वाले अपने दरवाजे पर एक कुर्सी डालें बैठा रहता था ।
मां, हम पांच भाई बहनों को घर पर छोड़ कर किसी काम से जाती तो कहती गली से बाहर मत जाना और मैं छेती को बोलती जाऊंगी कि तुम्हें बाहर ना जाने दे । मुझे दूसरे भाई बहनों का तो पता नहीं पर मैं बाहर जाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं करती थी ।
जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हालात खराब हो गए, तब हम बच्चे छत पर जाकर छेती के घर की तरफ देखते, पर वहां कुछ भी असामान्य ना दिखता जैसा सब पहले था, वैसा ही था । उस समय ही हमें पता चला कि छेती सरदार है।
मैं करीब 14 -15 साल की उम्र तक उस जगह रही, पर छेती के बारे में बस इतना ही जान सकी । उसके परिवार के बारे में तो कुछ भी नहीं पता । ना उसे किसी से झगड़ते देखा ना ही फालतू बातें करते हुए ।
धीरे-धीरे जब सब हालात सामान्य होने लगे तो सब कुछ पहले जैसा ही हो गया । फिर से वह दूध और कोयला बेचने लगा । बच्चे वैसे ही उसे छेती छेती कहकर चिढ़ा कर भागते और मैं वैसे ही हमेशा की तरह उससे दूर रहती । यहां तक कि उसे चिढ़ाती भी नहीं थी ।
क्रमशः

0 टिप्पणियाँ