समंदर समेटे अपने में कहीं राज यहां
दिख रहाउछलकर चलता हुआ
कभी मचलता हुआ
नदियों को समाहित करता हुआ
ना जाने क्या बात है इसमें
हर कोई दीवाना इसका
दूर-दूर से लोग हैं आते
देखने इसकी अद्भुत काया
ऊपर से शांत भीतर से उग्र
इसका तो हर रूप निराला
दूर-दूर तक रेत हैं फैली
मन को है मोहक लगने वाली
मंथन से निकला अद्भुत खजाना
संसार भी है इसका दीवाना
भरे हुए बहुमूल्य रत्न
जंतुओं से भरपूर समुद्र
स्वाति नक्षत्र की बूंद पड़े
सीप में मोती बन जाए
पूर्णमासी पर ज्वार भाटा आए
ऐसे ही जीवन समुंद्र में
रोज उतार-चढ़ाव है आए
ढूंढो मत उसकी गहराइयां
बस चलते जाओ तुम यहां
पार करो जीवन समुंदर
हंस कर तुम सब यहां।।
दिल की कलम से
मधु अरोड़ा

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