उसके 
पुष्पित 
पल्लवित 
हर्षोल्लासित 
संसार के शीश से 
काल ने जब 
एक झटके में 
सतरंगे आकाश की चादर खींची 
तो 
धरती खुद व खुद 
न जाने कब 
रसातल को चली गई 
पता ही नहीं चला 
विधुवत् अनवरत सुधा स्रवित करती 
बिंदिया असंख्य ज्वाल पुँजों की वाहक बन 
तन मन दहन करने लगी 
कामिनी की श्रृंगार 
प्रीतम की मनुहार 
चूड़ी की खनकार 
कोमल कलाइयों को घायल कर 
असह्य भार बाहक बन रहीं हैं 
प्रलय के विनाशकारी बादलों से 
तड़प कर बिजली ने
जीते जागते जीवन को 
श्मशान बना दिया 
हे विधाता 
यह कैसा मजाक है 
जब पतझड़ ही नियति थी उसकी
तो फिर 
बसन्ती हवाओं के अधूरे स्वप्न क्यों ? 




                     देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद