धरती माँ का प्यार हमारा, 
इसमें ही तो जीवन सारा, 

कृषक का है इसमें चारा, 
उपजा है अन्न इसमें प्यारा, 

मेहनत का इसमें है गारा, 
प्रकृति का खेल है सारा, 

धरती माँ का प्यार हमारा,
इसमें ही तो जीवन सारा, 

कृषक को नियती ने मारा, 
दोहन सूद खोर का  सारा,

पस्त हुआ किसान बिचारा, 
कहाँ से लाये साधन सारा, 

धरती माँ का प्यार हमारा, 
इसमें ही तो जीवन सारा, 

धरती पर अत्याचार सारा, 
छलनी हो गया सीना सारा, 

तरु तमालों को कोचर मारा, 
जहँ तहँ देखो वहाँ उजारा, 

धरती माँ का प्यार हमारा, 
इसमें  ही तो  जीवन सारा, 

समझा समझा सब को हारा, 
सम्पदा में ही जीवन हमारा ,

नदी को पाटा खेत उजारा, 
कहाँ से होगा सबका गुजारा, 

धरती माँ का प्यार हमारा, 
इसमें  ही तो जीवन सारा, 

सबका तो है वो पालनहारा, 
इसका  कौन  करे  परवारा,

माँ ने किया हम पर उपकारा,
धरती ने दिया उपहार हमारा, 

धरती माँ का प्यार हमारा, 
इसमें  ही तो जीवन सारा ।

     काव्य रचना -रजनी कटारे 
            जबलपुर(म.प्र.)